Ka Mere Man Mah Base Vrindawan Var Dham

अभिलाषा
कब मेरे मन महँ बसै, वृन्दावन वर धाम
कब रसना निशि दिन रटै, सुखते श्यामा श्याम
कब इन नयननिते लखूँ, वृन्दावन की धूरि
जो रसिकनि की परम प्रिय, पावन जीवन मूरि
कब लोटूँ अति विकल ह्वै, ब्रजरज महँ हरषाय
करूँ कीच कब धूरि की, नयननि नीर बहाय
कब रसिकनि के पैर परि, रोऊँ ह्वैके दीन
कब प्रिय दर्शन बिनु बनूँ, विकल नीर बिनु मीन
कब अति कोमल चित रसिक, मोकूँ हिये लगाय
गहकि मिलैं सिर कर धरैं, मगन होहिं अपनाय
वृन्दावन महँ सखिनि संग, कब निरखूँ नँद नन्द
मोर मुकुट सिर बेनु कर, कारी कमरी कन्ध
कब मोकूँ यशुमति तनय, सखा समुझि लै संग
खेलैं वृन्दा-विपिन महँ, परसे मेरो अंग
कदँब तले ठाड़े उभय, दीये युगल गल बाँह
मोर मुकुट में चन्द्रिका, सटी कपोल उछाँह
राधा बाधा हरन द्वै, अच्छर हिय में धारी
भवसागर तरि जाइगो, सबही सोच बिसारि

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *