Prabhu Ki Kaisi Sundar Riti

करुणामय प्रभु
प्रभु की कैसी सुन्दर रीति
विरुद निभाने के कारण ही पापीजन से प्रीति
गई मारने बालकृष्ण को, स्तन पे जहर लगाया
उसी पूतना को शुभगति दी, श्लाघनीय फल पाया
सुने दुर्वचन शिशुपाल के, द्वेषयुक्त जो मन था
लीन किया उसको अपने में, अनुग्रह तभी किया था
हरि चरणों में मूर्ख व्याध ने, भूल से बाण चलाया
करुणा-सागर है प्रभु ऐसे, स्वधाम उसे भिजवाया
कितने ही दुख पड़े झेलने, नाथ मुझे जीवन में
मानव देह आपने ही दी, भूलूँ कभी न मन में

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