Priti Ki Rit Na Jane Sakhi

प्रीति की रीति
प्रीति की रीत न जाने सखी, वह नन्द को नन्दन साँवरिया
वो गायें चराये यमुना तट, और मुरली मधुर बजावत है
सखियों के संग में केलि करे, दधि लूटत री वह नटवरिया
संग लेकर के वह ग्वाल बाल, मग रोकत है ब्रज नारिन को
तन से चुनरी-पट को झटके, सिर से पटके जल गागरिया
वृन्दावन की वह कुंजन में, गोपिन के संग में रास रचे
पग नुपूर की धुन बाज रही, नित नाचत है मन-मोहनिया
जो भक्तों के सर्वस्व श्याम, ब्रज में वे ही तो विहार करें
‘ब्रह्मानंद’ न कोई जान सके, वह तीनों लोक नचावनिया

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