Tum Taji Aur Kon Pe Jau

परम आश्रय
तुम तजि और कौन पै जाऊँ
काके द्वार जाइ सिर नाऊँ, पर हथ कहाँ बिकाऊँ
ऐसे को दाता है समरथ, जाके दिये अघाऊँ
अंतकाल तुम्हरै सुमिरन गति, अनत कहूँ नहिं पाऊँ
भव-समुद्र अति देखि भयानक, मन में अधिक डराऊँ
कीजै कृपा सुमिरि अपनो प्रन, ‘सूरदास’ बलि जाऊँ

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