Krishna Katha Nit Hi Sune

सदुपदेश
कृष्ण-कथा नित ही सुनें, श्रद्धा प्रेम बढ़ाय
जो भी वस्तु परोक्ष हो, सुनें ध्यान में आय
नेत्र-कोण की लालिमा, मन्द मन्द मुस्कान
वस्त्राभूषण प्रीतिमा, मोहन का हो ध्यान
श्रीहरि के माहात्म्य का, करे नित्य ही गान
सुदृढ़ प्रेम उन से करें, माधुरी का रस-पान
श्रवण, कीर्तन, भजन हो, स्वाभाविक हरि-ध्यान
विषयों में रुचि हो नहीं, यही भक्ति का मान
हरि स्मरण, नित भजन की, पड़ जाये जो बान
पातक जो छोटे बड़े, भस्म करें भगवान
मन-मन्दिर में आ बसे, राधाकृष्ण स्वरूप
अभिव्यक्ति संभव नहीं, परम भक्ति का रूप
अक्षय-वट के पात्र में, सोये बाल-मुकुंद
सुधामयी मुसकान है, पाणि चरण अरविन्द
करते सृष्टि विश्व की, हों न किन्तु अनुरक्त
प्राणि-मात्र में चेतना, होती हरि की व्यक्त

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