Manwa Nahi Vichari Re

पछतावा (राजस्थानी)
मनवा नहीं विचारी रे
थारी म्हारी करता उमर बीति सारी रे
बालपणा में लाड़-लड़ायो, माता थारी रे
भर जोबन में लगी लुगाई सबसे प्यारी रे
बूढ़ो हुयो समझ में आई, ऊमर हारी रे
व्यर्थ बिताई करी एक बस, थारी म्हारी रे
मिनख जनम खो दियो, तू जप ले कृष्ण मुरारी रे
अन्तकाल थारो सुधर जायगो वो ही रखवारी रे 

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