Trashna Hi Dukh Ka Karan Hai

तृष्णा
तृष्णा ही दुःख का कारण है
इच्छाओं का परित्याग करे, संतोष भाव आ जाता है
धन इतना ही आवश्यक है जिससे कुटंब का पालन हो
यदि साधु सन्त अतिथि आये, उनका भी स्वागत सेवा हो
जो सुलभ हमें सुख स्वास्थ्य कीर्ति, प्रारब्ध भोग इसको कहते
जो झूठ कपट से धन जोड़ा, फलस्वरूप अन्ततः दुख सहते
उसकी रक्षा की चिन्ता हो, कुछ भी तो साथ नहीं जाता
सत्कर्म किया हो जीवन में, सद्भाव काम में तब आता 

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