Rup Rasi Shri Radha Rani

श्री राधा
रूपरासि श्री राधा रानी
मोहन की मन मोहिनि भामिनि, सखियन की स्वामिनी सुखदानी
कनक कान्ति कमनीय कलेवर, तापै नील निचोल सुहानी
चंद्रवदन पे चारु चन्द्रिका, चहुँ दिसि अहो छटा छिटकानी
कनक करधनी सोहै अनुपम, रतन जटित नहिं जात बखानी
पायन की पायल की रुनझुन, सुनि मुनिजन की मति बौरानी
मोहन हूँ की सोहनी स्वामिनि, याँकी छबि को कहे बखानी
स्वयं गिरा की होत न गति जहँ, जो सिंगार सार सुख दानी

Radha Ju Mo Pe Aaj Dharo

श्री राधाजी की कृपा
राधाजू! मो पै आजु ढरौ
निज, निज प्रीतम की पद-रज-रति, मोय प्रदान करौ
विषम विषय रस की सब आशा, ममता तुरत हरौ
भुक्ति मुक्ति की सकल कामना, सत्वर नास करौ
निज चाकर चाकर की सेवा मोहि प्रदान करौ
राखौ सदा निकुंज निभृत में, झाड़ूदार बरौ

Aaj Barsane Bajat Badhai

श्री राधा प्राकट्य
आज बरसाने बजत बधाई
प्रगट भई वृषभानु गोप के सबही को सुखदाई
आनँद मगन कहत युवती जन, महरि बधावन आई
बंदीजन, मागध, याचक, गुन, गावत गीत सुहाई
जय जयकार भयो त्रिभुवन में, प्रेम बेलि प्रगटाई
‘सूरदास’ प्रभु की यह जीवन-जोरी सुभग बनाई

Radha Ghar Kanan Main Radha

जीवन सर्वस्व राधा
राधा घर, कानन में राधा, राधा नित यमुना के तीर
राधा मोद, प्रमोद राधिका, राधा बहै नयन बन नीर
राधा प्राण बुद्धि सब राधा, राधा नयनों की तारा
राधा ही तन मन में छाई, प्रेमानंद सुधा धारा
राधा भजन, ध्यान राधा ही, जप तप यज्ञ सभी राधा
राधा सदा स्वामिनी मेरी, परमाराध्या श्रीराधा

Aaj Vrashbhanu Geh Anand

श्री राधा जन्मोत्सव
आज वृषभानु गेह आनन्द
वदन प्रभा सी लागत मानो, प्रगट्यो पूरन-चंद
बजे बाजने नाचे गाये, कोइ सुनावत टेर
सुनि सब नारि बधावन आई, किये बिना कछु देर
नंदराय अरु जसुमति रानी, न्योता पा चलि आये
सुनतहि सबन भरे आनंद में, हुलसि भेंट को लाये
अपने अपने मन को भाये, करत सकल ब्रज लोग
‘सूरदास’, प्रगटी पृथ्वी पर, भक्तजन के हितजोग

Aaj Ki Bela Sukhkari

श्री श्री राधा प्राकट्य
आज की बेला सुखकारी
प्रगट भई वृषभानु-नंदिनी, कीरति प्राण-पियारी
गावत सभी बधाई हिलमिल, बरसाने की नारी
अत्यधिक, आनंद महल में बरनत रसना हारी
नौबत बजत और शहनाई, नाचत सखियाँ सारी
नंद यशोदा सुनसुख पायें, हरषे हिय में भारी
भादौ मास, गगन घन छाये, बिजुरी चमके न्यारी
चहुँ ओर है खुशियाँ छाई, ब्रज में प्रिया पधारी 

Tab Nagari Man Harash Bhai

श्री राधा की प्रीति
तब नागरि मन हरष भई
नेह पुरातन जानि स्याम कौ, अति आनंदमई
प्रकृति पुरुष, नारी मैं वे पति, काहे भूलि गई
को माता, को पिता, बंधु को, यह तो भेंट नई
जनम जनम जुग जुग यह लीला, प्यारी जानि लई
‘सूरदास’ प्रभु की यह महिमा, यातैं बिबस भई

Aaj Rawal Main Jay Jaykar

श्रीश्री राधा प्राकट्य
आज रावल में जय-जयकार
भयो यहाँ वृषभानु गोप के, श्री राधा अवतार
सज-धज के सब चलीं वेग तें, गावत मंगलाचार
पृथ्वी पर त्रिभुवन की शोभा, रूप रासि सुखसार
निरखत गावत देत बधाई, तभी भीर भई द्वार
‘परमानँद’ वृषभानु- नंदिनी, जोरी नंदकुमार

Pragat Bhai Sobha Tribhuwan Ki

राधा प्राकट्य
प्रगट भई सोभा त्रिभुवन की, श्रीवृषभानु गोप के आई
अद्भुत रूप देखि ब्रजबनिता, रीझि – रीझि के लेत बलाई
नहिं कमला न शची, रति, रंभा, उपमा उर न समाई
जा हित प्रगट भए ब्रजभूषन, धन्य पिता, धनि माई
जुग-जुग राज करौ दोऊ जन, इत तुम, उत नँदराई
उनके मनमोहन, इत राधा, ‘सूरदास’ बलि जाई

Udho Hamen Na Shyam Viyog

प्रीति की रीति
ऊधौ! हमें न श्याम वियोग
सदा हृदय में वे ही बसते, अनुपम यह संजोग
बाहर भीतर नित्य यहाँ, मनमोहन ही तो छाये
बिन सानिध्य श्याम के हम को, कुछ भी नहीं सुहाये
तन में, मन में, इस जीवन में, केवल श्याम समाये
पल भर भी विलग नहीं वे होते, हमें रोष क्यों आये
सुनकर उद्धव के अंतर में, उमड़ पड़ा अनुराग
पड़े राधिका के चरणों में, सुध-बुध कर परित्याग