Prat Bhayo Jago Gopal

प्रभाती
प्रात भयौ, जागौ गोपाल
नवल सुंदरी आई बोलत, तुमहिं सबै ब्रजबाल
प्रगट्यौ भानु, मन्द भयौ चंदा, फूले तरुन तमाल
दरसन कौं ठाढ़ी ब्रजवनिता, गूँथि कुसुम बनमाल
मुखहि धोई सुंदर बलिहारी, करहु कलेऊ लाल
‘सूरदास’ प्रभु आनंद के निधि, अंबुज-नैन बिसाल

Nand Ghar Aaj Bhayo Anand

श्री कृष्ण प्राकट्य
नन्द घर आज भयो आनन्द
मातु यशोदा लाला जायो, ज्यों पूनों ने चन्द
गोपी गोप गाय गायक-गन, सब हिय सरसिज वृन्द
नन्दनँदन रवि उदित भये हिय, विकसे पंकज वृन्द
वसुधा मुदित समीर बहत वर, शीतल मन्द सुगन्ध
गरजत मन्द मन्द घन नभ महँ, प्रकटे आनँद कन्द
माया बन्धु सिन्धु सब सुख के, स्वयं सच्चिदानन्द
‘प्रभु’ के प्रभु विभु विश्वविदित वर, काटैं यम के फन्द

Tum Bin Jiwan Bhar Bhayo

शरणागति
तुम बिन जीवन भार भयो!
कब लगि भटकाओगे प्रीतम, हिम्मत हार गयो
कहाँ करों अब सह्यो जात नहिं, अब लौ बहुत सह्यो
अपनो सब पुरुषारथ थाक्यों, तव पद सरन गह्यो
सरनागत की पत राखत हो, सब कोऊ यही कह्यो
करुणानिधि करुणा करियो मोहि, मन विश्वास भयो

Bhajan Ko Namahi Nam Bhayo

भजन महिमा
भजन को नामहि नाम भयो
जासों द्रवहि न प्राननाथ, वह कैसे भजन भयो
कर माला, मुख नाम, पै न मन में कोई भाव रह्यो
केवल भयो प्रदरसन, लोगन हूँ ने भगत कह्यो
पायो मानुष जन्म, वृथा ऐसे ही समय गयो
मन में साँची लगन होय सो, साँचो भजन कह्यो
बिरह व्यथा में बीतहिं वासर, रैन न चैन लह्यो
असन वसन हूँ भारी लागें, तो कछु भजन भयो

Man Tu Kahe Bhayo Achet

प्रबोधन
मन! तू काहे भयो अचेत
भटकत रह्यो व्यर्थ में अब तक, कियो न हरि से हेत
पायो मानुष-जन्म हाय! तू ताहि वृथा कर देत
अरे भूलि हीरा कों बौरे, करत काँच सो हेत
प्राननाथ सों प्रीति न करि तू, पूजत पामर प्रेत
सुमिर सुमिर रे! सदा स्याम को, संतत स्नेह समेत