Shankar Teri Jata Main Shamil Hai Gang Dhara

शिवशंकर
शंकर तेरी जटा में शोभित है गंग-धारा
काली घटा के अंदर, चपला का ज्यों उजारा
गल मुण्डमाल राजे, शशि शीश पर बिराजे
डमरू निनाद बाजे, कर में त्रिशूल साजे
मृग चर्म वसन धारी, नंदी पे हो सवारी
भक्तों के दुःख हारी, गिरिजा के सँग विहारी
शिव नाम जो उचारे, सब पाप दोष जारे
भव-सिंधु से ‘ब्रह्मानंद’, उस पार शिव उतारे

Bhula Raha Hai Tu Youwan Main

नवधा भक्ति
भूला रहा तू यौवन में, क्यों नहीं समझता अभिमानी
तू राग, द्वेष, सुख, माया में, तल्लीन हो रहा अज्ञानी
जो विश्वसृजक करुणासागर की तन्मय होकर भक्ति करे
प्रतिपाल वहीं तो भक्तों के, सारे संकट को दूर करें
हरि स्मरण कीर्तन, दास्य, सख्य, पूजा और आत्मनिवेदन हो
हरि-कथा श्रवण हो, वन्दन हो, अरु संतचरण का सेवन हो
ये नवधा भक्ति के प्रकार, जिनकी मन में अभिलाषा हो
हो तीर्थ, दान, व्रत जीवन में, इनके प्रति भी उत्कण्ठा हो

Anand Adhik Hai Bhakti Main

भक्ति-भाव
आनन्द अधिक है भक्ति में
आकर्षण ऐसा न त्याग में, योग, ज्ञान या यज्ञों में
गोदी में बैठ यशोदा के, जो माँ का मोद बढ़ाते
वे बिना बुलाये प्रायः ही, पाण्डव के घर प्रभु आते
रुक्मिणी के हित व्याकुल इतने, सो नहीं रात्रि में पाते
वे लगते गले सुदामा के तो अश्रु प्रवाहित होते
गोपीजन के संग रास रचे, वे माता से बँध जाते
हम करें भक्ति ऐसे प्रभु की, भवनिधि से पार लगाते

Maya Se Tarna Dustar Hai

माया
माया से तरना दुस्तर है
आसक्ति के प्रति हो असंग, दूषित ममत्व बाहर कर दें
मन को पूरा स्थिर करके, प्रभु सेवा में अर्पित कर दें
पदार्थ सुखी न दुखी करते, व्यर्थ ही भ्रम को मन में रखते
होता न ह्रास वासना का, विपरीत उसकी वृद्धि करते
मन को नहीं खाली छोड़े हम, सत्संग संत से करते हों
उनके कथनों का चिन्तन हो, जिससे मन की परिशुद्धि हो
स्वाध्याय, प्रार्थना, देवार्चन, अथवा दिन में जो कार्य करे
पल भर भी प्रभु को नहीं भूले, मन को उनसे संलग्न करे

Kahan Ke Pathik Kahan Kinh Hai Gavanwa

परिचय
कहाँ के पथिक कहाँ, कीन्ह है गवनवा
कौन ग्राम के, धाम के वासी, के कारण तुम तज्यो है भवनवा
उत्तर देस एक नगरी अयोध्या, राजा दशरथ जहाँ वहाँ है भुवानवा
उनही के हम दोनों कुँवरावा , मात वचन सुनि तज्यो है भवनवा
कौन सो प्रीतम कौन देवरवा ! साँवरो सो प्रीतम गौर देवरवा
‘तुलसिदास’ प्रभु आस चरन की मेरो मन हर लियो जानकी रमणवा

Karmo Ka Fal Hi Sukh Dukh Hai

कर्म-फल
कर्मों का फल ही सुख दुख है
जिसने जैसा हो कर्म किया, उसका फल वह निश्चित पायेगा
जो कर्म समर्पित प्रभु को हो, तो वह अक्षय हो जायेगा
जो भी ऐसा सत्कर्मी हो, वह उत्तम गति को पायेगा
जो व्यक्ति करे निष्काम कर्म, सर्वथा आश्रित प्रभु के ही
ऐसे भक्तों का निस्संदेह, उद्धार स्वयं प्रभु करते ही

Mila Hai Janma Manav Ka

प्रबोधन
मिला है जन्म मानव का, गँवाया किन्तु यौवन को
साथ में कुछ न जायेगा, चेत जा, याद कर प्रभु को
अभी से आत्मचिंतन हो, पढ़ो तुम नित्य गीता को
निदिध्यासन मनन भी हो, छुड़ा दे मोह माया को
साधना के अनेकों पंथ भी, निर्गुण सगुण कोई
श्रेष्ठ पर ज्ञान ही का मार्ग, दिखा सकते गुरू सोई
स्वयं एक बात को समझो, देह नश्वर है यह तो तथ्य
ब्रह्म ही सर्व व्यापक है, सनातन है वही एक सत्य
जला दो भक्ति रूपी योग से, सारे ही कर्मों को
करो सत्संग सन्तों का, मिटा देंगे अविद्या को

Jaki Gati Hai Hanuman Ki

हनुमान आश्रय
जाकी गति है हनुमान की
ताकी पैज पूजि आई, यह रेखा कुलिस पषान की
अघटि-घटन, सुघटन-विघटन, ऐसी विरुदावलि नहिं आन की
सुमिरत संकट सोच-विमोचन, मूरति मोद-निधान की
तापर सानुकूल गिरिजा, शिव, राम, लखन अरु जानकी
‘तुलसी’ कपि की कृपा-विलोकनि, खानि सकल कल्यान की

Krishna Ghar Nand Ke Aaye Badhai Hai Badhai Hai

श्रीकृष्ण प्राकट्य
कृष्ण घर नंद के आये, बधाई है बधाई है
करो सब प्रेम से दर्शन, बधाई है बधाई है
भाद्र की अष्टमी पावन में प्रगटे श्याम मनमोहन
सुखों की राशि है पाई, बधाई है बधाई है
मुदित सब बाल, नर-नारी, चले ले भेंट हाथों में
देख शोभा अधिक हर्षित, बधाई है बधाई है
कृष्ण हैं गोद जननी के, खिल उठे हृदय पंकज दल
करें सब भेंट अति अनुपम, बधाई है बधाई है
सुर मुनि हुए हर्षित जो, बने थे ग्वाल अरु गोपी
परम आनन्द उर छाया, बधाई है बधाई है
बज उठी देव-दुंदुभियाँ, गान करने लगे किन्नर
स्वर्ग से पुष्प बरसाये, बधाई है बधाई है

Yashoda Nand Gopijan Dukhi Hai

विरह वेदना
यशोदा, नन्द, गोपीजन, दुखी है विरह पीड़ा से
परम प्यारा सभी का मैं, कहे यो श्याम उद्धव से
उधोजी ब्रज में जाकर के, मिले तब नन्द बाबा से
कभी गोविंद आयेंगे, यों पूछा नन्द ने उनसे
बही तब आँसुओं की धार, यशोदा नन्द नयनों से
रुँध गया कण्ठ दोनों का, बोल ना पाय उधो से
बँधाया धैर्य उद्धव ने, कहा श्रीकृष्ण आयेंगे
कहा था जो मैं आऊँगा, कथन को वे निभायेंगे
कहा है श्यामसुन्दर ने ‘विलग मैं हूँ नहीं तुमसे’
रखो मन पास में मेरे, सुलभ हूँ प्रेम भक्ति से