Sakhi Meri Nind Nasani Ho

विरह व्यथा
सखी, मेरी नींद नसानी हो
पिव को पंथ निहारत सिगरी, रैण बिहानी हो
सखियन मिल कर सीख दई मन, एक न मानी हो
बिन देख्याँ कल नाहिं पड़त, जिय ऐसी ठानी हो
अंग-अंग व्याकुल भये मुख ते, पिय पिय बानी हो
अंतर-व्यथा विरह की कोई, पीर न जानी हो
चातक जैहि विधि रटे मेघ कूँ, मछली जिमि पानी हो
‘मीराँ’ अति अधीर विरहिणी, सुध-बुध बिसरानी हो

Prabhu Tum Ho Din Bandhu

प्रार्थना
प्रभु! तुम हो दीनबन्धु, हम दास हैं तुम्हारे
माता पिता तुम्हीं हो, एकमात्र तुम सहारे
ज्योतित सभी हैं तुम से, रवि चाँद हों कि तारे
हैं प्राणवान तुमसे, पशु पक्षी जीव सारे
हों पाप दोष हमसे, तुम से छिपें न प्यारे
सन्तान हम तुम्हारी, होएँ न तुमसे न्यारे
पीड़ा जनम मरण की, दूजा नहीं निवारे
हे नाथ तुम छुड़ा दो, संकट सकल हमारे

Ho Ji Hari Kit Gaye Neha Lagay

विरह व्यथा
हो जी हरि!कित गए नेहा लगाय
नेह लगाय मेरो मन हर लियो, रस-भरी टेर सुनाय
मेरे मन में ऐसी आवै, प्राण तजूँ विष खाय
छाँड़ि गए बिसवासघात करि, नेह की नाव चढ़ाय
‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, रहे मधुपुरी छाय

Prem Ho To Shri Hari Ka

कृष्ण कीर्तन
प्रेम हो तो श्री हरि का प्रेम होना चाहिये
जो बने विषयों के प्रेमी उनपे रोना चाहिये
दिन बिताया ऐश और आराम में तुमने अगर
सदा ही सुमिरन हरि का करके सोना चाहिये
मखमली गद्दों पे सोये तुम यहाँ आराम से
वास्ते लम्बे सफर के कुछ बिछौना चाहिये
छोड़ गफलत को अरे मन, पायी जो गिनती की साँस
भोग और विषयों में फँस, इनको न खोना चाहिये
सब जगह बसते प्रभु पर, प्रेम बिन मिलते नहीं
कृष्ण-कीर्तन में लगा मन, मग्न होना चाहिये

Anurag Gopiyon Jaisa Ho

गोपियों की प्रीति
अनुराग गोपियों जैसा हो
श्रीकृष्ण प्रेम का मूर्तिमान, विग्रह है श्री राधाजी ही
महाभाव रूप उनका पावन,राधारानी का प्रेम वही
श्री राधा का उद्देश्य यही, बस सुख पहुँचाएँ प्यारे को
वे करते प्रेम प्रियाजी से, यह श्रेय श्री कृष्ण बड़प्पन को
जीवन में जो कुछ सुख दुख है, हम स्वीकारें सहर्ष उसे
सर्वोच्च भाव श्रीकृष्ण-प्रेम, अपनायें हम तन्मयता से

Man Main Shubh Sankalp Ho

अभिलाषा
मन में शुम संकल्प हों, शुरू करूँ जब काम
सर्वप्रथम सुमिरन करूँ, नारायण का नाम
मनोवृत्ति वश में रहे, कार्यसिद्धि को पाय
ऋद्धि-सिद्धि गणपति सहित, पूजूँ विघ्न न आय
नहीं चाहिये जगत् या राज्य स्वर्ग सुख-भोग
प्राणिमात्र का दुख हरूँ, सुखी रहें सब लोग
सभी रोग से रहित हों, सबका हो कल्याण
दीन दुखी कोई न हो, भरें खेत, खलिहान
नहीं कामना स्वर्ग की, ना चाहूँ निर्वाण
राजपाट नहिं चाहता, सबका हो कल्याण
गो, ब्राह्मण का हो भला, सभी सुखी हों लोग
पृथ्वी का पालन करें, शासक करें न भोग
नहीं किसी से बैर हो, और नहीं हो मोह
रहे सदा यह भावना, प्राणिमात्र से छोह
शुभ ही देखें नयन से, सुनें शब्द शुभ कान
पूर्ण आयु होकर जियें, सेवा कर्म महान् 

Uddeshya Purna Yah Jiwan Ho

जीवन का उद्देश्य
उद्देश्यपूर्ण यह जीवन हो
लक्ष्य के प्रकार पर ही निर्भर, मानव स्वरूप जैसा भी हो
जो सुख की खोज में भटक रहे, प्रायः दुःख ही मिलता उनको
हो जाय समर्पित यह जीवन, एकमात्र प्रभु के पाने को
वे अन्दर ही हैं दूर नहीं, प्रभु की इच्छा सर्वोपरि हो
सौंप दे समस्याएँ भी उनको, निश्चित प्रशांत तब मन भी हो
नारायण जो अच्युत, अनन्त, भक्ति से उनको प्राप्त करें
वह दिव्य ज्योति व दिव्य प्रेम, जो अविचल शांति प्रदान करें

Mahaveer Aapki Jay Ho

महावीर हनुमान
महावीर आपकी जय जय हो
संताप, शोक, हरने वाले, हनुमान आपकी जय जय हो
सात्विक-गुण बुद्धि के सागर, अंजनी पुत्र की जय जय हो
आनन्द बढ़ाये रघुवर का, केसरी-नंदन की जय जय हो
माँ सीता के दुख दूर किये, इन पवन-पुत्र की जय जय हो
भुज-दण्ड बड़े जिनके प्रचण्ड, रुद्रावतार की जय-जय हो
भव का भय नष्ट करे मेरे, बजरंग बली की जय जय हो 

Kathinai Se Dhan Arjan Ho

सात्विक दान
कठिनाई से धन अर्जन हो, और दान कर पाये
धन का लोभ सदा ही रहता, त्याग कठिन हो जाये
याद रहे अधिकांश धर्म में व्यय हो, कमी न आये
कुएँ से जल जितना निकले, फिर से वह भर जाये
धन कमाय जो भी ईमान से, वह सात्विक कहलाये
कृषि एवं व्यवसाय से अर्जित, राजस श्रेणी पाये 

Rahte Ho Saath Nitya Prabhu Ji

पूजा
रहते हो साथ नित्य प्रभुजी, आठ प्रहर दिन रात ही
क्यों देख नहीं पाते तुमको, यह अचरज मुझको खलता ही
मैं बैठ के नित्य ही आसन पर, लेकर सामग्री हाथों में
पूजा करता हूँ विधिवत ही, तब भी दर्शन नहीं पाता मैं
आरती दीप से करता हूँ, स्तुति गान भी हूँ गाता
तब भी तुम क्यों न पिघलते हो, अनुभव भी नहीं मुझे होता
यह कैसा खेल तुम्हारा है, कुछ नहीं समझ में भी आता
लगता अभाव श्रद्धा का ही, जिसकी न पूर्णता कर पाता