Are Man Jap Le Prabhu Ka Nam

नाम स्मरण
अरे मन जप ले प्रभु का नाम
पाँच तत्व का बना पींजरा, मढ़ा उसी पर चाम
आज नहीं कल छूट जायगा, भज ले करुणाधाम
द्रुपद-सुता ने उन्हें पुकारा, वसन रूप भये श्याम
श्रद्धा-भाव रहे मन में नित, जपो प्रभु का नाम
अजामील ने पुत्र-भाव से, नारायण का लिया नाम
सुलभ हो गई सद्गति उसको, पहुँचा उन के धाम
आर्तजनों के वे हितकारी, भज मन आठों याम
सब सुकृत का सार यही, भज राधा-कृष्ण ललाम  

Trashna Hi Dukh Ka Karan Hai

तृष्णा
तृष्णा ही दुःख का कारण है
इच्छाओं का परित्याग करे, संतोष भाव आ जाता है
धन इतना ही आवश्यक है जिससे कुटंब का पालन हो
यदि साधु सन्त अतिथि आये, उनका भी स्वागत सेवा हो
जो सुलभ हमें सुख स्वास्थ्य कीर्ति, प्रारब्ध भोग इसको कहते
जो झूठ कपट से धन जोड़ा, फलस्वरूप अन्ततः दुख सहते
उसकी रक्षा की चिन्ता हो, कुछ भी तो साथ नहीं जाता
सत्कर्म किया हो जीवन में, सद्भाव काम में तब आता 

Shri Krishna Ka Virah

श्री चैतन्य महाप्रभु
श्री कृष्ण का विरह आपको आठों ही प्रहर सताये
श्री महाप्रभु चैतन्य वही जो राधा भाव दिखाये
राधा कान्ति कलेवर अनुपम, भक्तों के मन भाये
रोम रोम में हाव भाव में, गीत कृष्ण के गाये
प्रेमावतार महाप्रभु अन्तस में, राधावर छाये
ओत प्रोत है कृष्ण-भक्ति से, जन-मन वही लुभाये

Are Ham Naam Jape Shiv Ka

शिव महिमा
अरे! हम नाम जपें शिव का, नित्य श्रद्धा से बारम्बार
महादेव की महिमा भारी, कोई न पाये पार
आशुतोष को भोले शंकर, कहता सब संसार
आप हिमालय पे गौरी संग, करे दिव्य अभिसार
रौद्र रूप में करते हैं शिव, दुष्टों का संहार
गंग विराजे जटा बीच, शशि मस्तक का श्रृंगार
बम बम भोले ओढरदानी, कर दो भवनिधि पार

Dushton Ka Sang Na Kabhi Karen

दुष्टों का संग
दुष्टों का संग न कभी करें
आचार जहाँ हो निंदनीय, मन में वह कलुषित भाव भरें
दुष्कर्मी का जहँ संग रहे, सद्गुण की वहाँ न चर्चा हो
क्रोधित हो जाता व्यक्ति तभी, विपरीत परिस्थिति पैदा हो
होता अभाव सद्बुद्धि का, मानवता वहाँ न टिक पाती
अभिशप्त न हो मानव जीवन, अनुकम्पा प्रभु की जब होती 

Shri Mahalakshmi Jag Janani Ka

श्रीमहालक्ष्मी स्तवन
श्री महालक्ष्मी जगजननी का, हम श्रद्धापूर्वक करें ध्यान
जिनका है वर्ण स्वर्ण जैसा, उनकी महिमा का करें गान
सद्भाव, अतिथि की सेवा हो, सत्कर्म जहाँ नित होता हो
देवार्चन-प्रेम भाव मन का, आवास वहीं हो माता का
माँ को अति प्रिय है शील सत्य, सत्संग कीर्तन जहाँ नित्य
जहाँ प्राणि-मात्र प्रति प्रेम भाव, वहाँ धन का नहीं होगा अभाव
जहाँ भोग, क्रूरता और क्लेश, दारिद्य वहाँ करता प्रवेश
व्यवहार कपट अरु वचन झूठ, महालक्ष्मी जाती वहाँ रूठ
सबके प्रति करुणा हो मन में, आस्तिकता श्रद्धा हो प्रभु में
करुणामयी मैया कृपा करो, कालुष्य हृदय का आप हरो

Avtar Hum Shri Raghav Ka

श्रीराम प्राकट्य
अवतार हुआ श्री राघव का, तो चैत्र-मास की नवमी थी
मौसम सुहावना सुखकारी, तब ऋतु बसंत छवि छाई थी
आनन्द विभोर अयोध्या थी, उन्मुक्त तरंगें सरयू की
हर्षातिरेक से भरी हुई, यह स्थिति मात कौसल्या की
चौथेपन में बेटा पाया, कोसलाधीश को हर्ष हुआ
मन चाहीं भेंट मिली सबको, नाचें गायें दें सभी दुआ
हो गये प्रफुल्लित सुर-गण भी, सब संत, विप्र आनंदित थे
हर्षातिरेक में शिव, ब्रह्मा, ऋषि मुनि सभी रोमांचित थे

Devi Doshon Ka Daman Kare

देवी चरित्र
देवी दोषों का दमन करे
करती कृपा सदा भक्तों पर, उनके कष्ट हरे
नष्ट करें दुष्टो को माता, कर त्रिशूल धरे
मूल प्रकृति से सृष्टि का सृजन, ये भी आप करे
चन्द्रवदनी माँ दिव्याभूषण, वस्त्र धरे रति लाजे
वे ही तो हिमाचल की पुत्री जो, शिव वामांग विराजै
महिषासुर निशुम्भ शुम्भ का भी, तो ध्वंस किया हे माता
रण सिंहिनी तुम्हीं हो देवी, पार न कोई पाता 

Shri Vrindavan Bhakti Ka

श्री वृन्दावन महिमा
श्रीवृन्दावन भक्ति का, अनुपम रसमय धाम
महिमा अपरम्पार है, कण कण राधे श्याम
वृन्दावन अनुराग का, केन्द्र श्रेष्ठ सुख-वास
यमुनाजी के पुलिन पर, श्याम रचाये रास
नाम, धाम, लीला सभी, श्रीहरि के ही रूप
ब्रज चौरासी कोस में, वृन्दा-विपिन अनूप
श्रीवृन्दावन कुंज में, विहरें श्यामा श्याम
क्रीड़ा नित नूतन करें, सुखद रूप अभिराम
गोवर्धन मथुरा यथा बरसाना, नंदग्राम
किन्तु रासलीला करें, वृन्दावन में श्याम
यद्यपि तीर्थ सब हैं बड़े, काशी, पुरी, प्रयाग
वृन्दावन में राधिका-कृष्ण भक्ति अनुराग
जिनको भी संसार में लगा ‘ज्ञान’ का रोग
वृन्दावन का रस उन्हें, दुलर्भ यह संयोग
वृन्दावन की धूल को, ब्रह्मादिक तरसाय
लोकपाल और देवता, सबका मन ललचाय
वृन्दावन का वास हो, मन में गोपी भाव
रस का आस्वादन करें, मिटे और सब चाव
उद्धवजी वर माँगते, हे गोविन्द घनश्याम
गुल्म-लता होके रहूँ , वृन्दाविपिन ललाम
वृन्दावन में बसत हैं, साधू सन्त समाज
राधे राधे सब कहें, श्री राधे का राज

Aatma Ka Bhojan Prarthana

प्रार्थना
आत्मा का भोजन प्रार्थना, भूले नहीं, प्रतिदिन करें
अन्तःकरण से प्रार्थना, सब शोक चिन्ता को हरें
जीवन में सच्ची शांति सुख, प्रभु प्रार्थना से प्राप्त हो
दत्त चित्त हो प्रार्थना करें, प्रतीति निश्चित सुलभ हो
मीराँ के मन में प्रेम था, तो विष भी अमृत हो गया
निष्काम होए प्रार्थना, समझो प्रभु ने सुन लिया
अध्यात्म की गहराइयों में, डूब कर हो प्रार्थना
हो भाव मन में समर्पण का, वरना तो मात्र प्रवंचना