Ram Krishna Kahiye Uthi Bhor

राम कृष्ण चरित्र
राम कृष्ण कहिये उठि भोर
श्री राम तो धनुष धरे हैं, श्री कृष्ण हैं माखन चोर
उनके छत्र चँवर सिंहासन, भरत, शत्रुघन, लक्ष्मण जोर
इनके लकुट मुकुट पीतांबर, नित गैयन सँग नंद-किशोर
उन सागर में सिला तराई, इन राख्यो गिरि नख की कोर
‘नंददास’ प्रभु सब तजि भजिए, जैसे निरखत चंद चकोर

Vaishnav Jan To Tene Kahiye

वैष्णव जन (गुजराती)
वैष्णव जन तो तेणे कहिए, जे पीर पराई जाणे रे
परदुःखे उपकार करे तोये, मन अभिमान न आणे रे
सकल लोक मा सहुने वंदे, निंदा करे न केणी रे
वाच काज मन निश्चल राखे, धन धन जननी तेणी रे
समदृष्टि ने, तृष्णा त्यागी, पर-स्त्री जेणे मात रे
जिह्वा थकी असत्य न बोले, पर धन झाले न हाथ रे
माया मोह न व्यापे जेणे, दृढ़ वैराग जेणा मन माँ रे
रामनाम शुँ ताली लागी, सकल तीरथ तेना तन माँ रे
निर्लोभी ने कपट रहित छे, काम क्रोध निरवार्या रे
‘नरसैयो’ तेनुँ दरसन करताँ, कुल एकोतेर तार्या रे