Aasakti Jagat Ki Nashta Kare

सत्संग की महिमा
आसक्ति जगत् की नष्ट करें, खुल जाता है मुक्ति का द्वार
स्वाध्याय, सांख्य व योग, त्याग, प्रभु को प्रसन्न उतने न करें
व्रत, यज्ञ, वेद या तीर्थाटन, यम, नियम, प्रभु को वश न करें
तीनों युग में सत्संग सुलभ, जो करे प्रेम से नर नारी
यह साधन श्रेष्ठ सुगम निश्चित, दे पूर्ण शांति व दुख-हारी
आत्म स्वरूप है नारायण, हम शरण उन्हीं की ग्रहण करें
एकमात्र भाव बस प्रभु का हो, तो वही परमपद प्राप्त करे 

Kahe Ko Soch Kare Manwa Tu

कर्मयोग
काहे को सोच करे मनवा तूँ! होनहार सब होता प्यारे
मंत्र जाप से शांति मिले पर, विधि -विधान को कैसे टारे
कर्म किया हो जैसा तुमने, तदनुसार प्रारब्ध बना है
जैसी करनी वैसी भरनी, नियमबद्ध सब कुछ होना है
हरिश्चन्द्र, नल, राम, युधिष्ठिर, नाम यशस्वी दुनिया जाने
पाया कष्ट गये वो वन में, कर्म-भोग श्रुति शास्त्र बखाने
शत्रु मित्र हम अपने होते, प्रभु व्याप्त सब जड़ चेतन में
पाप जले बस कर्मयोग से, धर्माचरण करो जीवन में

Jo Nishchal Bhakti Kare

शिव आराधना
जो निश्छल भक्ति करे उसको, भोले शम्भू अपना लेते
वे धारण करें रजोगुण को, और सृष्टि की रचना करते
होकर के युक्त सत्त्वगुण से, वे ही धारण पोषण करते
माया त्रिगुणों से परे प्रभु, शुद्ध स्वरूप स्थित होते
ब्रह्मा, विष्णु, अरु, रुद्र, रूप, सृष्टि, पालन,लय वहीं करें
हैं पूर्ण ब्रह्म प्रभु आशुतोष, अपराध हमारे क्षमा करें

Tan Man Se Gopiyan Priti Kare

व्यथित गोपियाँ
तन मन से गोपियाँ प्रीति करें, यही सोच कर प्रगटे मोहन
कटि में पीताम्बर वनमाला और मोर मुकुट भी अति सोहन
कमनीय कपोल, मुस्कान मधुर, अद्वितीय रूप मोहन का था
उत्तेजित कर तब प्रेम भाव जो परमोज्ज्वल अति पावन था
वे कण्ठ लगे उल्लास भरें, श्रीकृष्ण करें क्रीड़ा उनसे
वे लगीं सोचने दुनियाँ मे, कोई न श्रेष्ठ ज्यादा हमसे
जब मान हुआ गोपीजन को, अभिमान शान्त तब करने को
सहसा हरि अंतर्ध्यान हुए, दारुण दुख हुआ गोपियों को

Devi Doshon Ka Daman Kare

देवी चरित्र
देवी दोषों का दमन करे
करती कृपा सदा भक्तों पर, उनके कष्ट हरे
नष्ट करें दुष्टो को माता, कर त्रिशूल धरे
मूल प्रकृति से सृष्टि का सृजन, ये भी आप करे
चन्द्रवदनी माँ दिव्याभूषण, वस्त्र धरे रति लाजे
वे ही तो हिमाचल की पुत्री जो, शिव वामांग विराजै
महिषासुर निशुम्भ शुम्भ का भी, तो ध्वंस किया हे माता
रण सिंहिनी तुम्हीं हो देवी, पार न कोई पाता 

Pitaron Ka Shradha Avashya Kare

पितृ-श्राद्ध
पितरों का श्राद्ध अवश्य करें
श्रद्धा से करे जो पुत्र पौत्र, वे पितरों को सन्तुष्ट करें
जो देव रुद्र आदित्य वसु, निज ज्ञान-शक्ति के द्वारा ही
किस योनी में उत्पन्न कहाँ, कोई देव जानते निश्चय ही
ये श्राद्ध वस्तु देहानुरूप, दे देते हैं उन पितरों को
विधि पूर्वक होता श्राद्ध कर्म, आशीष सुलभ सन्तानों को
हरि-कीर्तन एवं पिण्ड दान भी इसी भाँति श्रेयस्कर है
हों उऋण सुखी हम पितरों से, परिवार हेतु आवश्यक है  

Prabhu Ki Upaasana Nitya Kare

पूजन-अर्चन
प्रभु की उपासना नित्य करे
जो सत्य अलौकिक देव-भाव, जीवन में उनको यहीं भरे
मन बुद्धि को जो सहज ही में, श्री हरि की प्रीति प्रदान करे
भौतिक उपचारों के द्वारा, यह संभव होता निश्चित ही
पूजन होए श्रद्धापूर्वक, अनिष्ट मिटे सारे तब ही
पूजा का समापन आरती से, हरि भजन कीर्तन भी होए
तन्मयता से जब कीर्तन हो, प्रभु की अनुकम्पा को पाए 

Prabhu Se Jo Sachcha Prem Kare

हरि-भक्ति
प्रभु से जो सच्चा प्रेम करे, भव-सागर को तर जाते हैं
हरिकथा कीर्तन भक्ति करे, अर्पण कर दे सर्वस्व उन्हें
हम एक-निष्ठ उनके प्रति हों, प्रभु परम मित्र हो जाते हैं
लाक्षागृह हो या चीर-हरण, या युद्ध महाभारत का हो
पाण्डव ने उनसे प्रेम किया, वे उनका काम बनाते है
हो सख्य-भाव उनसे अपना, करुणा-निधि उसे निभायेंगे
सुख-दुख की बात कहें उनसे, वे ही विपदा को हरते हैं  

Budhapa Bairi Tu Kyon Kare Takor

वृद्धा अवस्था
बुढ़ापा बैरी, तूँ क्यों करे टकोर
यौवन में जो साथ रहे, वे स्नेही बने कठोर
जीर्ण हो गया अब तन सारा, रोग व दर्द सताते
गई शक्ति बोलो कुछ भी तो, ध्यान कोई ना देते
चेत चेत रे मनवा अब तो, छोड़ सभी भोगों को
राम-कृष्ण का भजन किये बिन, ठोर नहीं हैं तुझको 

Jankinath Sahay Kare Tab

रामाश्रय
जानकीनाथ सहाय करे, तब कौन बिगाड़ सके नर तेरो
सूरज, मंगल, सोम, भृगुसुत, बुध और गुरु वरदायक तेरो
राहु केतु की नाहिं गम्यता, तुला शनीचर होय है चेरो
दुष्ट दुशासन निबल द्रौपदी, चीर उतारण मंत्र विचारो
जाकी सहाय करी यदुनन्दन, बढ़ गयो चीरको भाग घनेरो
गर्भकाल परीक्षित राख्यो, अश्वत्थामा को अस्त्र निवार्यो
भारत में भूरही के अंडा, तापर गज को घंटो गेर्यो
जिनकी सहाय करे करूणानिधि, उनको जग में भाग्य घनेरो
रघुवंशी संतन सुखदायी, ‘तुलिदास’ चरनन को चेरो