Braj Ke Birahi Log Dukhare

वियोग
ब्रज के बिरही लोग दुखारे
बिन गोपाल ठगे से ठाढ़े, अति दुरबल तनु कारे
नन्द जसोदा मारग जोवत, नित उठि साँझ सकारे
चहुँ दिसि ‘कान्ह कान्ह’ करि टेरत, अँसुवन बहत पनारे
गोपी गाय ग्वाल गोसुत सब, अति ही दीन बिचारे
‘सूरदास’ प्रभु बिन यों सोभित, चन्द्र बिना ज्यों तारे

Main Giridhar Ke Rang Rati

गिरिधर के रंग
मैं गिरिधर के रंग राती
पचरँग चोला पहर सखी मैं, झिरमिट रमवा जाती
झिरमिट में मोहि मोहन मिलिग्यो, आनँद मंगल गाती
कोई के पिया परदेस बसत हैं, लिख-लिख भेजें पाती
म्हारे पिया म्हारे हिय में बसत हैं, ना कहुँ आती जाती
प्रेम भट्ठी को मैं मद पीयो, छकी फिरूँ दिन राती
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणाँ चित लाती

Gayon Ke Hit Ka Rahe Dhyan

गो माता
गायों के हित का रहे ध्यान
गो-मांस करे जो भी सेवन, निर्लज्ज व्यक्ति पापों की खान
गौ माँ की सेवा पुण्य बड़ा, भवनिधि से करदे हमें पार
वेदों ने जिनका किया गान, शास्त्र पुराण कहे बार-बार
गौ-माता माँ के ही सदृश, वे दु:खी पर हम चुप रहते
माँ की सेवा हो तन मन से, भगवान कृष्ण को वह पाते

Prabal Prem Ke Pale Padkar

भक्त के भगवान्
प्रबल प्रेम के पाले पड़कर, प्रभु को नियम बदलते देखा
अपना मान भले टल जाये, भक्त का मान न टलते देखा
जिनके चरण-कमल कमला के, करतल से न निकलते देखा
उसको ब्रज करील कुंजन के, कण्टक पथ पर चलते देखा
जिनकी केवल कृपा दृष्टि से, सकल सृष्टि को पलते देखा
उनको गोकुल के गोरस पर, सौ-सौ बार मचलते देखा
शिव ब्रह्मा सनकादिक द्वारा जिनका ध्यान स्तवन देखा
उनको ग्वाल-सखा मण्डल में, लेकर गेंद उछलते देखा
जिसकी बंक-भृकुटि के भय से, सागर सप्त उबलते देखा
उन्हें यशोदा माँ के भय से, अश्रु-बिन्दु दृग ढलते देखा 

Ye Din Rusibe Ke Nahi

दर्शन की प्यास
ये दिन रूसिबै के नाहीं
कारी घटा पवन झकझोरै, लता तरुन लपटाहीं
दादुर, मोर, चकोर, मधुप, पिक, बोलत अमृत बानी
‘सूरदास’ प्रभु तुमरे दरस बिन, बैरिन रितु नियरानी

Main To Sanware Ke Rang Rachi

प्रगाढ़ प्रीति
मैं तो साँवरे के रँग राची
साजि सिंगार बाँधि पग घुँघरू, लोक-लाज तजि नाची
गई कुमति लई साधु की संगति, स्याम प्रीत जग साँची
गाय गाय हरि के गुण निस दिन, काल-ब्याल सूँ बाँची
स्याम बिना जग खारो लागत, और बात सब काँची
‘मीराँ’ गिरिधर-नटनागर वर, भगति रसीली जाँची

Giridhari Ke Rang Mainrachi

प्रीति माधुरी
गिरिधारी के रंग में राची
सुध बुध भूल गई मैं तो सखि, बात कहूँ मैं साँची
मारग जात मिले मोहि सजनी, मो तन मुरि मुसकाने
मन हर लियो नंद के नंदन, चितवनि माँझ बिकाने
जा दिन ते मेरी दृष्टि परी सखि, तब से रह्यो न जावै
ऐसा है कोई हितू हमारो, श्याम सों हमें मिलावै 

Prabhu Ke Sharnagat Hua Aaj

शरणागति
प्रभु के शरणागत हुआ आज
था अहंकार से उपहत मैं, कुछ कर न सका कर्तव्य काज
इन्द्रिय-विषयों में रमा रहा, नहीं स्मरण किया श्रीकृष्ण तुम्हें
सादर प्रणाम श्रीचरणों में, नहीं भक्त भूलते कभी जिन्हें
मैं ऊब गया जग झंझट से, झँझानिल दुष्कर भवसागर
शरणागत-पालक आप विभो, हे अमित-शक्ति करुणासागर
हे परम पुरुष अन्तर्यामी, करनी मेरी सब दोषयुक्त
मैं विषय भोग में रंमू नहीं, हरि कर्म-जाल से करो मुक्त
विनती सेवा में यही प्रभो! अविलम्ब पकड़लो हाथ आप
कोई न सहारा अब दूजा, मिट जाये सारे पाप-ताप

Radha Ju Ke Pran Govardhandhari

राधा प्रेमी स्याम
राधा जू के प्रान गोवर्धनधारी
तरु-तमाल प्रति कनक लतासी, हरि की प्रान राधिका प्यारी
मरकत-मणि सम श्याम छबीलो, कंचन-तन-वृषभानु दुलारी
‘सूरदास’ प्रभु प्रीति परस्पर, जोरी भली बनी बनवारी

Jivan Ke Din Char Re Man Karo Punya Ke Kam

नाशवान संसार
जीवन के दिन चार रे, मन करो पुण्य के काम
पानी का सा बुदबुदा, जो धरा आदमी नाम
कौल किया था, भजन करूँगा, आन बसाया धाम
हाथी छूटा ठाम से रे, लश्कर करी पुकार
दसों द्वार तो बन्द है, निकल गया असवार
जैसा पानी ओस का, वैसा बस संसार
झिलमिल झिलमिल हो रहा, जात न लागे बार
मक्खी बैठी शहद पे, लिये पंख लपटाय
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, लालच बुरी बलाय