Kahan Ke Pathik Kahan Kinh Hai Gavanwa

परिचय
कहाँ के पथिक कहाँ, कीन्ह है गवनवा
कौन ग्राम के, धाम के वासी, के कारण तुम तज्यो है भवनवा
उत्तर देस एक नगरी अयोध्या, राजा दशरथ जहाँ वहाँ है भुवानवा
उनही के हम दोनों कुँवरावा , मात वचन सुनि तज्यो है भवनवा
कौन सो प्रीतम कौन देवरवा ! साँवरो सो प्रीतम गौर देवरवा
‘तुलसिदास’ प्रभु आस चरन की मेरो मन हर लियो जानकी रमणवा

Ham Bhaktan Ke Bhakta Hamare

भक्त के भगवान
हम भक्तन के, भक्त हमारे
सुन अर्जुन, परतिग्या मेरी, यह व्रत टरत न टारे
भक्तै काज लाज हिय धरिकैं, पाय-पियादे धाऊँ
जहँ-जहँ भीर परै भक्तन पै, तहँ-तहँ जाइ छुड़ाऊँ
जो मम भक्त सों बैर करत है, सो निज बैरी मेरो
देखि बिचारि, भक्तहित-कारन, हाँकत हौं रथ तेरो
जीते जीत भक्त अपने की, हारे हारि बिचारौं
‘सूरदास’ सुनि भक्त-विरोधी, चक्र सुदर्शन धारौ

Sakhi Ri Main To Rangi Shyam Ke Rang

श्याम का रंग
सखी री मैं तो रंगी श्याम के रंग
पै अति होत विकल यह मनुआ, होत स्वप्न जब भंग
हो नहिं काम-काज ही घर को, करहिं स्वजन सब तंग
किन्तु करुँ क्या सहूँ सब सजनी, चढ्यो प्रेम को रंग
आली, चढ़ी लाल की लाली, अँग-अँग छयो अनंग
स्याममयी हो गई सखी मैं तो, रहूँ स्याम के संग

Jin Ke Sarvas Jugal Kishor

युगल श्री राधाकृष्ण
जिनके सर्वस जुगलकिशोर
तिहिं समान अस को बड़भागी, गनि सब के सिरमौर
नित्य विहार निरंतर जाको, करत पान निसि भोर
‘श्री हरिप्रिया’ निहारत छिन-छिन, चितय नयन की कोर 

Bhagwan Krishna Ke Charno Main

स्तुति
भगवान् कृष्ण के चरणों में, मैं करूँ वंदना बारंबार
जो प्राणि-मात्र के आश्रय हैं, भक्तों के कष्ट वही हरतें
ब्रह्मादि देव के भी स्वामी, मैं करूँ प्रार्थना बारंबार
जो आदि अजन्मा भी यद्यपि हैं, पर विविध रूप धारण करते
पृथ्वी पर लीलाएँ करते, मैं करूँ स्तवन बारंबार
जब संकट से हम घिर जाते, करूणानिधि ही रक्षा करते
उन के पूजन से दु:ख कटे, मैं करूँ अर्चना बारंबार
जो परम तेज, जो परम ब्रह्म, अज्ञान पाप को वे हरते
स्वामी त्रिलोक के वासुदेव, मैं करूँ वंदना बारंबार

Janak Mudit Man Tutat Pinak Ke

धनुष भंग
जनक मुदित मन टूटत पिनाक के
बाजे हैं बधावने, सुहावने सुमंगल-गान
भयो सुख एकरस रानी राजा राँक के
दुंदभी बजाई, सुनि हरषि बरषि फूल
सुरगन नाचैं नाच नाय कहू नाक के
‘तुलसी’ महीस देखे दिन रजनीस जैसे
सूने परे सून से, मनो मिटाय आँक के

Hamare Nirdhan Ke Dhan Ram

प्रबोधन
हमारे निर्धन के धन राम
चोर न लेत घटत नहिं कबहूँ, आवत गाढ़ैं काम
जल नहिं बूड़त, अगिनि न दाहत, है ऐसो हरि नाम
वैकुण्ठनाथ सकल सुख दाता, ‘सूरदास’ सुख-धाम

Atulit Bal Ke Dham

महावीर वन्दना
अतुलित बल के धाम पवनसुत, तेज प्रताप निधान
राम जानकी हृदय बिराजै, संकटहर हनुमान
अग्रगण्य ज्ञानी अंजनि-सुत, सद्गुण के हो धाम
अजर अमर हो सिद्धि प्रदाता, रामदूत अभिराम
कंचन वर्ण आपके वपु का, घुँघराले वर केश
हाथों में है वज्र, ध्वजा अरु अति विशिष्ट है वेश
गमन आपका मन सदृश है, छोह करे श्रीराम
रामचरित के रत्न आपको, शत शत करूँ प्रणाम
  

Jiwan Ke Din Bas Char Bache

भक्ति भाव
जीवन के दिन बस चार बचे, क्यों व्यर्थ गँवाये जाता है
क्यों भक्ति योग का आश्रय ले, कल्याण प्राप्त नहीं करता है
अज्ञान तिमिर को दूर करे, भगवान कपिल उपदिष्ट यही
माँ देवहूति को प्राप्त वही, जो नहीं सुलभ अन्यत्र कहीं
श्रद्धापूर्वक निष्काम भाव से, नित्य कर्म अति उत्तम है
प्रतिमा दर्शन,पूजा सेवा, स्तुति भजन श्रेयस्कर है
तू, काम, क्रोध से होए मुक्त, सारे संकट भी हो समाप्त
कर्तव्य, भक्ति में लीन रहे, तो परम सिद्धि हो सहज प्राप्त
जो जीव मात्र में प्राण रूप, अन्तर्यामी चैतन्य विभो
अध्यात्म शास्त्र का श्रवण करे,लीला जो करते वही प्रभो
अपने जैसा सबको समझे, यम नियम आदि का पालन हो
है त्याज्य अहं, प्राणी हिंसा, सत्संग करें संकीर्तन हो

Bhav Ke Bhukhe Prabhu Hain

भाव के भूखे
भाव के भूखे प्रभु हैं, भाव ही तो सार है
भाव से उनको भजे जो, उसका बेड़ा पार है
वस्त्र भूषण या कि धन हो, सबके दाता तो वही
अर्पण करें सर्वस्व उनको, भाव तो सच्चा यही
भाव से हम पत्र, जल या पुष्प उनको भेंट दे
स्वीकारते उसको प्रभु, भव-निधि से हमको तार दे
प्रेम के प्यासे प्रभु हैं, गोपियों ने जो दिया
भगवान् उनके हो गये, सोचें कि हमने क्या किया