Kali Nam Kam Taru Ram Ko

राम स्मरण
कलि नाम कामतरु राम को
दलनिहार दारिद दुकाल दुख, दोष घोर धन धाम को
नाम लेत दाहिनों होत मन वाम विधाता वाम को
कहत मुनीस महेस महातम, उलटे सूधे नाम को
भलो लोक – परलोक तासु जाके बल ललित – ललाम को
‘तुलसी’ जग जानियत नामते, सोच न कूच मुकाम को

Kahe Ko Tan Manjta Re Mati Main Mil Jana Hai

सत्संग महिमा
काहे को तन माँजता रे, माटी में मिल जाना है
एक दिन दूल्हा साथ बराती, बाजत ढोल निसाना है
एक दिन तो स्मशान में सोना, सीधे पग हो जाना है
सत्संगत अब से ही करले, नाहिं तो फिर पछताना है
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, प्रभु का ध्यान लगाना है

Jag Janani Radhika Ko Pranam

श्री राधा माहात्म्य
जगजननी राधिका को प्रणाम
सच्चिदानन्द विग्रह जिनका, लीला रस की वे दिव्य धाम
जो परमतत्व श्रीकृष्ण उन्हीं की, परम शक्ति हैं श्रीराधा
वे शक्तिमान की आत्मा ही, हर लें भक्तों की भव बाधा
जो सकल कलाओं की प्रसविनि, सुन्दरता की वे प्रतिमा हैं
भगवान कृष्ण के मन को वे मोहित आल्हादित करती हैं
श्री राधारानी हैं प्रकाश तो भुवन भास्कर माधव हैं
ज्योत्सना रूप तो श्रीराधा, वे पूर्णचन्द्र मुरलीधर हैं
एक ही स्वरूप दोनों का है, महिमा अनन्त राधाजी की
श्रीकृष्ण कृपा जिस पर होए, अनूभूति मिले प्रियाजी की

Braj Ko Bacha Lo Mohan

गोवर्धन लीला
ब्रज को बचा लो मोहन, रक्षा करो हमारी
हो कु्रद्ध शची के पति ने, वर्षा करी है भारी
आँधी भी चल रही है, ओले बरस रहे हैं
पानी से भर गया ब्रज, सब कष्ट से घिरे हैं
गिरिराज को उखाड़ा, ले हाथ पर हरि ने
उसको उठाये रक्खा, दिन सात तक उन्होंने
ब्रज हो गया सुरक्षित, पानी उतर गया था
तब पूर्ववत प्रभु ने, गिरिराज को रखा था
श्रीकृष्ण को लगाया, हृदय से था सभी ने
और देवता लगे सब, पुष्पों की वर्षा करने

Man Madhav Ko Neku Niharhi

हरि पद प्रीति
मन माधव को नेकु निहारहि
सुनु सठ, सदा रंक के धन ज्यों, छिन छिन प्रभुहिं सँभारहि
सोभा-सील ज्ञान-गुन-मंदिर, सुन्दर परम उदारहि
रंजन संत, अखिल अघ गंजन, भंजन विषय विकारहि
जो बिनु जोग जग्य व्रत, संयम, गयो चहै भव पारहि
तो जनि ‘तुलसिदास’ निसि वासर, हरिपद कमल बिसारहि

Jiwan Ko Vyartha Ganwaya Hai

चेतावनी
जीवन को व्यर्थ गँवाया है
मिथ्या माया जाल जगत में, फिर भी क्यों भरमाया है
मारी चोंच तो रुई उड़ गई, मन में तूँ पछताया है
यह मन बसी मूर्खता कैसी, मोह जाल मन भाया है
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, मनुज जन्म जो पाया है

Ja Ko Manvranda Vipin Haryo

वंदनावन-महिमा
जाको मन वृन्दा विपिन हर्यो
निरिख निकुंज पुंज-छवि राधे, कृष्ण नाम उर धर्यो
स्यामा स्याम स्वरूप सरोवर, परी जगत् बिसर्यो
कोटि कोटि रति काम लजावै, गोपियन चित्त हर्यो
‘श्रीभट’ राधे रसिकराय तिन्ह, सर्वस दै निबर्यो

Mangal Diwas Chathi Ko Aayo

उत्सव
मंगल दिवस छठी को आयो
आनन्दित नंदराय जसोदा, मानों निर्धन धन को पायो
न्हवा कान्ह को जसुमति मैया, कुल देवी के चरण परायो
विविध भाँति के व्यंजन धर के, देवी को भलिभाँति मनायो
सब ब्रज नारी बधावन आई, बालकृष्ण को तिलक करायो
जय जयकार होत गोकुल में, ‘परमानंद’ हरषि जस गायो

Rajan Ram Lakhan Ko Dije

विश्वामित्र की याचना
राजन! राम-लखन को दीजै
जस रावरो, लाभ बालक को, मुनि सनाथ सब कीजै
डरपत हौं, साँचे सनेह बस, सुत प्रभाव बिनु जाने
पूछो नाम देव अरु कुलगुरु, तुम भी परम सयाने
रिपु दल दलि, मख राखि कुसल अति, अल्प दिननि घर ऐंहैं
‘तुलसिदास’ रघुवंस तिलक की, कविकुल कीरति गेहैं

Mat Kar Moh Tu Hari Bhajan Ko Man Re

भजन महिमा
मत कर मोह तू, हरि-भजन को मान रे
नयन दिये दरसन करने को, श्रवण दिये सुन ज्ञान रे
वदन दिया हरि गुण गाने को, हाथ दिये कर दान रे
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, कंचन निपजत खान रे