Dhanya Nand Dhani Jasumati Rani

धन्य नन्द-यशोदा
धन्य नन्द, धनि जसुमति रानी
धन्य ग्वाल गोपी जु खिलाए, गोदहि सारंगपानी
धन्य व्रजभूमि धन्य वृन्दावन, जहँ अविनासी आए
धनि धनि ‘सूर’ आह हमहूँ जो, तुम सब देख न पाए

Nand Bhawan Ko Bhushan Bhai

कृष्ण कन्हैया
नंद भवन को भूषन भाई
अतुलित शोभा स्याम सुँदर की नवनिधि ब्रज में छाई
जसुमति लाल वीर हलधर को राधारमन परम सुखदाई
काल को काल, परम् ईश्वर को सामर्थ अतुल न तोल्यो जाई
‘नन्ददास’ को जीवन गिरिधर, गोकुल गाँव को कुँवर कन्हाई

Nand Dwar Ek Jogi Aayo Singi Nad Bajayo

शिव द्वारा दर्शन
नंद द्वार इक जोगी आयो सिंगी नाद बजायो
सीस जता ससि बदन सोहायो, अरुन नयन छबि छायो
रोवत खीजत कृष्ण साँवरो, रहत नहीं हुलरायो
लियो उठाय गोद नँदरानी, द्वारे जाय दिखायो
अलख अलख करि लियो गोद में, चरन चूमि उर लायो
श्रवण लाग कछु मंत्र सुनायो, हँसि बालक किलकायो
चिर-जीवौ सुत महरि तिहारो, हौं योगी सुख पायो
‘सूरदास’ रमि चल्यो रावरो, संकर नाम बतायो

Nand Mahar Ghar Bajat Badhai

श्रीकृष्ण प्राकट्य
नंद महर घर बजत बधाई,
बड़े भाग्य जाये सुत जसुदा, सुनि हरषे सब लोग लुगाई
भाँति भाँति सो साज साजि सब, आये नंदराय गृह धाई
नाचहिं गावहिं हिय हुलसावहिं, भरि-भरि भाण्ड के लई मिठाई
भयो अमित आनन्द नंदगृह, करहिं महर सबकी पहुनाई
‘परमानँद’ छयो त्रिभुवन में, चिरजीवहु यह कुँवर कन्हाई

Nand Gharni Sut Bhalo Padhayo

बाल क्रीड़ा
नंद-घरनि! सुत भलौ पढ़ायौ
ब्रज-बीथिनि पुर-गलिनि, घरै घर, घात-बाट सब सोर मचायौ
लरिकनि मारि भजत काहू के, काहू कौ दधि –दूध लुटायौ
काहू कैं घर में छिपि जाये, मैं ज्यों-त्यों करि पकरन पायौ
अब तौ इन्हें जकरि के बाँधौ, इहिं सब तुम्हरौ गाँव भगायौ
‘सूर’ श्याम-भुज गहि नँदरानी, बहुरि कान्ह ने खेल रचायौ

Nand Rani Ji Ke Putra Hua

श्रीकृष्ण प्राकट्य
नन्दरानीजी के पुत्र हुआ
यह सुन करके ब्रज में सबके मन में भारी आनन्द हुआ
कई मनौतियाँ अरु पुण्यों के परिणाम रूप बेटा आया
तभी बधाई में दाई ने, मनचाहा रत्न हार पाया
गोप गोपियाँ सजे धजे, आशीष दे रहे लाला को
चिरजीवों यशोदा के लाल, परिपूर्ण कर दिया आशा को
डफ झाँझ लिये नाचे गावें, हल्दी से मिले हुवे दधि को
ग्वाले आपस में छिड़क रहे, दे रहे भेंट इक दूजे को
नन्दराय आज हैं अति प्रसन्न, जिसने जो माँगा उसे दिया
ब्रज में समृद्धि भरपूर हुई, कोई न पार इसका पाया

Nand Dham Khelat Hari Dolat

बाल क्रीड़ा
नन्द –धाम खेलत हरि डोलत
जसुमति करति रसोई भीतर, आपुन किलकत बोलत
टेरि उठी जसुमति मोहन कौं, आवहु काहैं न धाइ
बैन सुनत माता पहिचानी, चले घुटुरुवनि पाइ
लै उठाइ अंचल गहि पोंछै, धूरि भरी सब देह
‘सोर्दास’ जसुमति रज झारति, कहाँ भरी यह खेह

Nain Bhar Dekhon Nand Kumar

श्रीकृष्ण प्राकट्य
नैन भर देखौं नंदकुमार
जसुमति कोख चन्द्रमा प्रकट्यो, जो ब्रज को उजियार
हरद दूब अक्षत दधि कुमकुम मंडित सब घर द्वार
पूरो चौक विविध रंगो से, गाओ मंगलाचार
चहुँ वेद-ध्वनि करत मुनि जन, होए हर्ष अपार
पुण्य-पुंज परिणाम साँवरो, सकल सिद्धि दातार
गोप-वधू आनन्दित निरखै, सुंदरता को सार
दास ‘चतुर्भुज’ प्रभु सुख सागर गिरधर प्रानाधार

Sabhi Taj Bhajiye Nand Kumar

श्री कृष्ण स्मरण
सभी तज भजिये नंदकुमार
और भजें ते काम सरे नहिं, मिटे न भव जंजार
यह जिय जानि, इहीं छिन भजि, दिन बीते जात असार
‘सूरदास’ औसर मत चूकै, पाये न बारम्बार

Bhajahun Re Man Shri Nand Nandan

नवधा भक्ति
भजहुँ रे मन श्री नँद-नन्दन, अभय चरण अरविन्द रे
दुर्लभ मानव-जनम सत्संग, तरना है भव-सिंधु रे
शीत, ग्रीष्म, पावस ऋतु, सुख-दुख, ये दिन आवत जात रे
कृपण जीवन भजन के बिन चपल सुख की आस रे
ये धन, यौवन, पुत्र, परिजन, इनसे मोह परितोष रे
कमल-नयन भज, जीवन कलिमल, करहुँ हरि से प्रीति रे
श्रवण, कीर्तन, स्मरण, वंदन, पाद-सेवन दास्य रे
सख्य, पूजन, आत्मनिवेदन, ‘गोविंददास’ अभिलाष रे