Pahchan Le Prabhu Ko

हरि स्मरण
पहचान ले प्रभु को, घट-घट में वास जिनका
तू याद कर ले उनको, कण कण में भी वही है
जिसने तुझे बनाया, संसार है दिखाया
चौदह भुवन में सत्ता, उनकी समा रही है
विषयों की छोड़ आशा, सब व्यर्थ का तमाशा
दिन चार का दिलासा, माया फँसा रही है
दुनियाँ से दिल हटा ले, ईश्वर का ध्यान कर ले
‘ब्रह्मानंद’ देह नश्वर, कल का पता नहीं है

Prabhu Ko Prasanna Ham Kar Paye

श्रीमद्भागवत
प्रभु को प्रसन्न हम कर पाये
चैतन्य महाप्रभु की वाणी, श्री कृष्ण भक्ति मिल जाये
कोई प्रेम भक्ति के बिना उन्हें, जो अन्य मार्ग को अपनाये
सखि या गोपी भाव रहे, संभव है दर्शन मिल जाये
हम दीन निराश्रय बन करके, प्रभु प्रेमी-जन का संग करें
भगवद्भक्तों की पद-रज को, अपने माथे पर स्वतः धरें
यशुमति-नंदन श्री कृष्णचन्द्र, आराध्य परम एक मात्र यही
दुनिया के बंधन तोड़ सभी, हम वरण करें बस उनको ही
उत्कृष्ट ग्रन्थ श्रीमद्भागवत, सब शास्त्रों का है यही सार
हम पढ़ें, नित्य संकीर्तन हो, प्रभु भक्ति का उत्तम प्रकार

Prasannata Prabhu Se Prapta Prasad

प्रसन्नता
प्रसन्नता, प्रभु से प्राप्त प्रसाद
जीवन तो संघर्ष भरा, मिटादे दुःख और अवसाद
अगर खिन्नता आड़े न आये, जीवन भी सुखमय हो
जब प्रसन्न सन्तुष्ट रहें तो, आनन्दमय सब कुछ हो
संग करें उन लोगों का, जो खिले पुष्प से रहते
कथा प्रभु की सुने कहें हम, पूर्ण शांति पा लेते
मनोरोग है चिन्ता भारी, कई कष्ट ले आता
हँसना है उपचार श्रेष्ठ, मन का तनाव भग जाता

Prabhu Tera Paar Na Paya

शरणागत
प्रभु तेरा पार न पाया
तूँ सर्वज्ञ चराचर सब में, तू चैतन्य समाया
प्राणी-मात्र के तन में किस विधि, तू ही तो है छाया
जीव कहाँ से आये जाये, कोई समझ न पाया
सूर्य चन्द्रमा तारे सब में, ज्योति रूप चमकाया
यह सृष्टि कैसी विचित्र है, उसमें मैं भरमाया
‘ब्रह्मानंद’ शरण में तेरी, छोड़ कुटुंबी आया

Prabhu Ke Sharnagat Hua Aaj

शरणागति
प्रभु के शरणागत हुआ आज
था अहंकार से उपहत मैं, कुछ कर न सका कर्तव्य काज
इन्द्रिय-विषयों में रमा रहा, नहीं स्मरण किया श्रीकृष्ण तुम्हें
सादर प्रणाम श्रीचरणों में, नहीं भक्त भूलते कभी जिन्हें
मैं ऊब गया जग झंझट से, झँझानिल दुष्कर भवसागर
शरणागत-पालक आप विभो, हे अमित-शक्ति करुणासागर
हे परम पुरुष अन्तर्यामी, करनी मेरी सब दोषयुक्त
मैं विषय भोग में रंमू नहीं, हरि कर्म-जाल से करो मुक्त
विनती सेवा में यही प्रभो! अविलम्ब पकड़लो हाथ आप
कोई न सहारा अब दूजा, मिट जाये सारे पाप-ताप

Prani Matra Prabhu Se Anupranit

प्रबोधन
प्राणिमात्र प्रभु से अनुप्राणित, जड़ चेतन में छाया
सबको अपने जैसा देखूँ, कोई नहीं पराया
जिसने राग द्वेष को त्यागा, उसने तुमको पाया
दंभ दर्प में जो भी डूबा, उसने तुमको खोया
कौन ले गया अब तक सँग में, धरा धाम सम्पत्ति
जो भी फँसा मोह माया में, उसको मिली विपत्ति
दो विवेक प्रभु मुझको कृपया, वैर न हो कोई से
सबसे प्रेम करूँ मैं स्वामी, प्रेम प्राप्त हो उनसे  

Laga Le Prem Prabhu Se Tu

शरणागति
लगाले प्रेम प्रभु से तू, अगर जो मोक्ष चाहता है
रचा उसने जगत् सारा, पालता वो ही सबको है
वही मालिक है दुनियाँ का, पिता माता विधाता है
नहीं पाताल के अंदर, नहीं आकाश के ऊपर
सदा वो पास है तेरे, ढूँढने क्यों तू जाता है
पड़े जो शरण में उसकी, छोड़ दुनियाँ के लालच को
वो ‘ब्रह्मानन्द’ निश्चय ही, परम सुख-धाम पाता है

Prabhu Ji Tum Chandan Ham Paani

दास्य भक्ति
प्रभुजी! तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी
प्रभुजी! तुम घन वन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा
प्रभुजी! तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरे दिन राती
प्रभुजी! तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहि मिलत सुहागा
प्रभुजी! तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करे ‘रैदासा’

Bhav Ke Bhukhe Prabhu Hain

भाव के भूखे
भाव के भूखे प्रभु हैं, भाव ही तो सार है
भाव से उनको भजे जो, उसका बेड़ा पार है
वस्त्र भूषण या कि धन हो, सबके दाता तो वही
अर्पण करें सर्वस्व उनको, भाव तो सच्चा यही
भाव से हम पत्र, जल या पुष्प उनको भेंट दे
स्वीकारते उसको प्रभु, भव-निधि से हमको तार दे
प्रेम के प्यासे प्रभु हैं, गोपियों ने जो दिया
भगवान् उनके हो गये, सोचें कि हमने क्या किया

Are Man Jap Le Prabhu Ka Nam

नाम स्मरण
अरे मन जप ले प्रभु का नाम
पाँच तत्व का बना पींजरा, मढ़ा उसी पर चाम
आज नहीं कल छूट जायगा, भज ले करुणाधाम
द्रुपद-सुता ने उन्हें पुकारा, वसन रूप भये श्याम
श्रद्धा-भाव रहे मन में नित, जपो प्रभु का नाम
अजामील ने पुत्र-भाव से, नारायण का लिया नाम
सुलभ हो गई सद्गति उसको, पहुँचा उन के धाम
आर्तजनों के वे हितकारी, भज मन आठों याम
सब सुकृत का सार यही, भज राधा-कृष्ण ललाम