Priti Pagi Shri Ladili Pritam Shyam Sujan

युगल से प्रीति
प्रीति पगी श्री लाड़िली, प्रीतम स्याम सुजान
देखन में दो रूप है, दोऊ एक ही प्रान
ललित लड़ैती लाड़िली, लालन नेह निधान
दोउ दोऊ के रंग रँगे, करहिं प्रीति प्रतिदान
रे मन भटके व्यर्थ ही, जुगल चरण कर राग
जिनहिं परसि ब्रजभूमि को, कन कन भयो प्रयाग
मिले जुगल की कृपा से, पावन प्रीति-प्रसाद
और न अब कछु चाह मन, गयो सकल अवसाद
मेरे प्यारे साँवरे, तुम कित रहे दुराय
आवहु मेरे लाड़िले! प्रान रहे अकुलाय

Bhaj Man Shri Radhe Gopal

श्रीराधाकृष्ण स्तुति
भज मन श्री राधे गोपाल
स्निग्ध कपोल, अधर-बिंबाफल लोचन परम विशाल
शुक-नासा, भौं दूज-चन्द्र-सम, अति सुंदर है भाल
मुकुट चंद्रिका शीश लसत है, घूँघर वाले बाल
रत्न जटित, कुंडल, कर-कंगन, गल मोतियन की माल
पग नूपुर-मणि-खचित बजत जब, चलत हंस गति चाल
गौर श्याम तनु वसन अमोलक, चंचल नयन विशाल
मृदु मुसकान मनोहर चितवन, गावत गीत रसाल
जिनका ध्यान किये सुख उपजे, दूर होत जंजाल
‘नारायण’ वा छबि को निरखत, पुनि पुनि होत निहाल

Shri Ram Jape Ham Kaise Hi

राम नाम महिमा
श्री राम जपें हम कैसे ही
उलटा नाम जपा वाल्मीकि ने, ब्रह्मर्षि हो गये वही
लिया अजामिल ने धोखे से नाम तर गया भवसागर
द्रुपद-सुता जब घिरी विपद् से, लाज बचाई नटनागर
गज, गणिका का काम बन गया, प्रभु-कृपा से ही तो
प्रतीति प्रीति हो दो अक्षर में, श्रीराम मिले उसको तो
रामनाम के पत्थर तर गये, सेतु बँधा सागर में
सेना पहुँच गई लंका में, निशिचर मरे समर में

Rup Rasi Shri Radha Rani

श्री राधा
रूपरासि श्री राधा रानी
मोहन की मन मोहिनि भामिनि, सखियन की स्वामिनी सुखदानी
कनक कान्ति कमनीय कलेवर, तापै नील निचोल सुहानी
चंद्रवदन पे चारु चन्द्रिका, चहुँ दिसि अहो छटा छिटकानी
कनक करधनी सोहै अनुपम, रतन जटित नहिं जात बखानी
पायन की पायल की रुनझुन, सुनि मुनिजन की मति बौरानी
मोहन हूँ की सोहनी स्वामिनि, याँकी छबि को कहे बखानी
स्वयं गिरा की होत न गति जहँ, जो सिंगार सार सुख दानी

Bhajahun Re Man Shri Nand Nandan

नवधा भक्ति
भजहुँ रे मन श्री नँद-नन्दन, अभय चरण अरविन्द रे
दुर्लभ मानव-जनम सत्संग, तरना है भव-सिंधु रे
शीत, ग्रीष्म, पावस ऋतु, सुख-दुख, ये दिन आवत जात रे
कृपण जीवन भजन के बिन चपल सुख की आस रे
ये धन, यौवन, पुत्र, परिजन, इनसे मोह परितोष रे
कमल-नयन भज, जीवन कलिमल, करहुँ हरि से प्रीति रे
श्रवण, कीर्तन, स्मरण, वंदन, पाद-सेवन दास्य रे
सख्य, पूजन, आत्मनिवेदन, ‘गोविंददास’ अभिलाष रे

Shri Vishnu Dattatrey Hi

भगवान दत्तात्रेय
श्री विष्णु दत्तात्रेय ही, सादर नमन उनको करुँ
रहते दिगम्बर वेष में, अज्ञान हरते सद्गुरु
दुख दूर करने प्राणियों का, तप किया मुनि अत्रि ने
बेटा बनूँगा आपका, बोला प्रकट हो विष्णु ने
आत्रेय माता अनसुया, जिनमें अहं निःशेष था
सर्वोच्च सती के रूप में, प्रख्यात उनका नाम था
सती धर्म की लेने परीक्षा, ब्रह्मा हरि हर आ गये
सामर्थ्य सती का था प्रबल, नवजात शिशु वे हो गये
अपना पिलाया दूध माँ ने, पूर्ववत् उनको किया
‘माँ! पुत्र होंगे हम तुम्हारे’, वरदान तीनों ने दिया
माँ अनसुया आत्रेय का, जय घोष श्रद्धा से करें
उपदेश व आदर्श उनका, हृदय में अपने धरें
श्री दत्त योगीराज थे, सिद्धों के परमाचार्य थे
निर्लोभ वे उपदेश दे, इसलिए गुरुदत्त थे
आह्लदकारी चन्द्रमा सा, वर्ण दत्तात्रेय का
काली जटा तन भस्म धारे, निर्देश देते ज्ञान का

Vando Shri Radha Charan

युगल स्वरूप झाँकी
वन्दौं श्री राधाचरन, पावन परम उदार
भय विषाद अज्ञानहर, प्रेम भक्ति दातार
रास-बिहारिनि राधिका, रासेश्वर नँद-लाल
ठाढ़े सुंदरतम परम, मंडल रास रसाल
मधुर अधर मुरली धरे, ठाढ़े स्याम त्रिभंग
राधा उर उमग्यौ सु-रस रोमांचित अँग-अंग
विश्वविमोहिनी श्याम की, मनमोहिनि रसधाम
श्याम चित्त उन्मादिनी, राधा नित्य ललाम
परम प्रेम-आनंदमय, दिव्य जुगल रस-रूप
कालिंदी-तट कदँब-तल, सुषमा अमित अनूप
सुधा-मधुर-सौंदर्य निधि, छलकि रहे अँग-अँग
उठत ललित पलपल विपुल, नव नव रूप तरंग
स्याम स्वामिनी राधिके! करौ कृपा को दान
सुनत रहैं मुरली मधुर, मधुमय बानी कान
करौ कृपा श्री राधिका! बिनवौं बारम्बार
बनी रहे स्मृति मधुर, मंगलमय सुखसार

Bhajo Re Man Shri Radha Govind

नाम स्मरण
भजो रे मन श्री राधा गोविंद
जन-मन को निज-धन-मनमोहन, पूरन परमानंद
जीवन के जीवन वे तेरे, तू चकोर वे चन्द
कैसे तिनहिं बिसारि भयो तूँ, मोह मुग्ध मतिमन्द
चेत-चेत रे अब तो मूरख, छोड़ सबहिं छल-छन्द
सब तज भज मोहन को प्यारे, यहीं पंथ निर्द्वंद 

Shri Vrindavan Bhakti Ka

श्री वृन्दावन महिमा
श्रीवृन्दावन भक्ति का, अनुपम रसमय धाम
महिमा अपरम्पार है, कण कण राधे श्याम
वृन्दावन अनुराग का, केन्द्र श्रेष्ठ सुख-वास
यमुनाजी के पुलिन पर, श्याम रचाये रास
नाम, धाम, लीला सभी, श्रीहरि के ही रूप
ब्रज चौरासी कोस में, वृन्दा-विपिन अनूप
श्रीवृन्दावन कुंज में, विहरें श्यामा श्याम
क्रीड़ा नित नूतन करें, सुखद रूप अभिराम
गोवर्धन मथुरा यथा बरसाना, नंदग्राम
किन्तु रासलीला करें, वृन्दावन में श्याम
यद्यपि तीर्थ सब हैं बड़े, काशी, पुरी, प्रयाग
वृन्दावन में राधिका-कृष्ण भक्ति अनुराग
जिनको भी संसार में लगा ‘ज्ञान’ का रोग
वृन्दावन का रस उन्हें, दुलर्भ यह संयोग
वृन्दावन की धूल को, ब्रह्मादिक तरसाय
लोकपाल और देवता, सबका मन ललचाय
वृन्दावन का वास हो, मन में गोपी भाव
रस का आस्वादन करें, मिटे और सब चाव
उद्धवजी वर माँगते, हे गोविन्द घनश्याम
गुल्म-लता होके रहूँ , वृन्दाविपिन ललाम
वृन्दावन में बसत हैं, साधू सन्त समाज
राधे राधे सब कहें, श्री राधे का राज

Adbhut Shri Vrindavan Dham

वृन्दावन
धामअद्भुत श्री वृन्दावन धाम
यमुनाजी की धारा बहती, केलि राधिका श्याम
मुरली की ध्वनि मधुर गूँजती और नाचते मोर
इकटक निरख रहे पशु पक्षी, नटवर नन्द-किशोर
बंशी स्वर, मयूर नृत्य में, स्पर्धा रुचिकारी
पाँख मोर की निकल पड़ी, तो मोहन सिर पर धारी
राधारानी के मयूर की, भेंट मिली कान्हा को
इसीलिये सहर्ष श्याम ने, स्वीकारी है इसको