शरणागति
सबसे प्रेम करो मन प्यारे, कोई जाति या वंश
द्वेष शत्रुता हो न किसी से, सब ही प्रभु के अंश
प्राणों में प्रभु शक्ति न ऐसी,करूँ तुम्हारा ध्यान
जड़ता भर दो इस जीवन में, बचे ने कुछ भी ज्ञान
मुझसे बड़ा न पापी कोई, मैंने पाप छिपाये
प्रायश्चित कर पाऊँ कैसे, समझ नहीं कुछ आये
बची न आशा अब तो प्रभुजी, पड़ा तुम्हारे द्वार
करूँ समर्पण जो भी मेरा, करो आप उद्धार 

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