Mohan Jagi Ho Bali Gai

प्रभाती
मोहन जागि, हौं बलि गई
तेरे कारन श्याम सुन्दर, नई मुरली लई
ग्वाल बाल सब द्वार ठाड़े, बेर बन की भई
गय्यन के सब बन्ध छूटे, डगर बन कौं गई
पीत पट कर दूर मुख तें, छाँड़ि दै अलसई
अति अनन्दित होत जसुमति, देखि द्युति नित नई
जगे जंगम जीव पशु खग, और ब्रज सबई
‘सूर’ के प्रभु दरस दीजै, अरुन किरन छई

Ab Jago Mohan Pyare

प्रभाती
अब जागो मोहन प्यारे
मात जसोदा दूध भात लिये, बैठी प्रात पुकारे
उठो मेरे मोहन आ मेरे श्याम, माखन मिसरी खारे
वन विचरन को गौएँ ठाड़ीं, ग्वाल बाल मिल सारे
तुम रे बिन एक पग नहिं चाले, राह कटत सब हारे
ना तुम सोये ना मैं जगाऊँ, लोग भरम भये प्यारे
दासी ‘मीराँ’ झुक झुक देखत, श्याम सूरति मतवारे

Jaago Bansi Ware Lalna

प्रभाती
जागो बंसीवारे ललना, जागो मोहन प्यारे
रजनी बीती भोर भयो है, घर घर खुले किवारे
गोपी दही मथत सुनियत है, कँगना के झनकारे
उठो लालजी भोर भयो है, सुर नर ठाड़े द्वारे
ग्वाल बाल सब करत कुलाहल, जय जय सबद उचारे
माखन रोटी करो कलेवा, गउवन के रखवारे
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, शरणागत कूँ तारे

Jagahu Jagahu Nand Kumar

प्रभाती
जागहु जागहु नंद-कुमार
रवि बहु चढ्यो रैन सब निघटी, उचटे सकल किवार
ग्वाल-बाल सब खड़े द्वार पै, उठ मेरे प्रानअधार
घर घर गोपी दही बिलोवै, कर कंकन झंकार
साँझ दुहां तुम कह्यो गाईकौं, तामें होति अबार
‘सूरदास’ प्रभु उठे तुरत ही, लीला अगम अपार

Jagahu Lal Gwal Sab Terat

प्रभाती
जागहु लाल ग्वाल सब टेरत
कबहुँ पीत-पट डारि बदन पर, कबहुँ उघारि जननि तन हेरत
सोवत में जागत मनमोहन, बात सुनत सब की अवसेरत
बारम्बार जगावति माता, लोचन खोलि पलक पुनि गेरत
पुनि कहि उठी जसोदा मैया, उठहु कान्ह रवि किरनि उजेरत
‘सूर’ स्याम हँसि चितै मातु-मुख, पट कर लै, पुनि-पुनि मुख फेरत

Prat Bhayo Jago Gopal

प्रभाती
प्रात भयौ, जागौ गोपाल
नवल सुंदरी आई बोलत, तुमहिं सबै ब्रजबाल
प्रगट्यौ भानु, मन्द भयौ चंदा, फूले तरुन तमाल
दरसन कौं ठाढ़ी ब्रजवनिता, गूँथि कुसुम बनमाल
मुखहि धोई सुंदर बलिहारी, करहु कलेऊ लाल
‘सूरदास’ प्रभु आनंद के निधि, अंबुज-नैन बिसाल