Bhaj Man Shri Radhe Gopal

श्रीराधाकृष्ण स्तुति
भज मन श्री राधे गोपाल
स्निग्ध कपोल, अधर-बिंबाफल लोचन परम विशाल
शुक-नासा, भौं दूज-चन्द्र-सम, अति सुंदर है भाल
मुकुट चंद्रिका शीश लसत है, घूँघर वाले बाल
रत्न जटित, कुंडल, कर-कंगन, गल मोतियन की माल
पग नूपुर-मणि-खचित बजत जब, चलत हंस गति चाल
गौर श्याम तनु वसन अमोलक, चंचल नयन विशाल
मृदु मुसकान मनोहर चितवन, गावत गीत रसाल
जिनका ध्यान किये सुख उपजे, दूर होत जंजाल
‘नारायण’ वा छबि को निरखत, पुनि पुनि होत निहाल

Bhaj Le Pyare Hari Ka Nam

नाम स्मरण
भजले प्यारे हरि का नाम, इसमें लगे न कुछ भी दाम
कर न बुराई कभी किसी की, जप ले मन से हरि का नाम
नयनों से दर्शन हो हरि का, सुनों कान से प्रभु का गान
करो तीर्थ सेवन पैरों से, करो हाथ से समुचित दान
मन बुद्धि श्रद्धा से प्यारे, होय नित्य ही हरि का ध्यान
एकमात्र साधन यह कलि में, शास्त्र संत का यही विधान 

Bhaj Man Ram Charan Sukh Dai

भज मन राम-चरण सुखदाई
जिहि चरनन ते निकसी सुर-सरि, शंकर-जटा समाई
जटा शंकरी नाम पर्यो है, त्रिभुवन तारन आई
जिन चरनन की चरन-पादुका, भरत रह्यो लवलाई
सोई चरन केवट धोइ लीन्हे, तब हरि नाव चढ़ाई
सोई चरन संतन जन सेवत, सदा रहत सुखदाई
सोई चरन गौतम ऋषि-नारी, परसि परम पद पाई
दंडक वन प्रभु पावन कीन्हो, ऋषि मन त्रास मिटाई
सोई प्रभु त्रिलोक के स्वामी, कनक मृगा सँग धाई
कपि सुग्रीव बन्धु भय व्याकुल, तब जय छत्र फिराई
रिपु को अनुज विभीषण निसिचर, परसत लंका पाई
शिव सनकादिक अरु ब्रह्मादिक, शेष सहस मुख गाई
‘तुलसिदास’ मारुत-सुत की प्रभु, निज मुख करत बड़ाई

Shri Ram Chandra Krapalu Bhaj Man

श्री राम स्तुति
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन, हरण भवभय दारुणम्
नवकंज-लोचन कंज-मुख कर-कंज पद-कंजारुणम्
कंदर्प अगणित अमित छबि, नव नील-नीरद-सुंदररम
पट-पीत मानहुँ तड़ित रूचि शुचि नौमि जनक-सुतावरम्
भजु दीन-बंधु दिनेश दानव, दैत्य-वंश निकंदनम्
रघुनंद आनंदकंद कौशलचंद दशरथ-नंदनम्
सिर मुकुट, कुण्डल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणम्
आजानु भुज, शर-चाप-धरि, संग्राम-जित-खरदूषणम्
इति वदति ‘तुलसीदास’ शंकर-शेष-मुनि-मन रंजनम्
मम ह्रदय कंज निवास कुरु, कामादि खल-दल गंजनम्

Bhaj Man Charan Kamal Avinasi

नश्वर संसार
भज मन चरण-कमल अविनासी
जे तई दीसे धरण गगन बिच, ते तई सब उठ जासी
कहा भयो तीरथ व्रत कीन्हें, कहा लिए करवत कासी
या देही को गरब न करियो, माटी में मिल जासी
यो संसार चहर की बाजी, साँझ पड्या उठ जासी
कहा भयो भगवाँ का पहर्या, घर तज के सन्यासी
जोगी होय जुगति नहिं जाणी, उलट जनम फिर आसी
अरज करे अबला कर जोरे, स्याम तुम्हारी दासी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, काटो जम की फाँसी

Bhaj Govindam Bhaj Govindam

भजनगोविन्दम्
भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, गोविन्दम् भज मूढ़मते
मैं, तूँ कौन कहाँ से आया, कौन पिता, पत्नी और जाया
माया मोह ने जाल बिछाया, जिसमें फँसकर तूँ भरमाया
खेल, पढ़ाई, यौवन-मद में, गई उम्र चिन्ता अब मन में
खो न समय संपत्ति संचय में, त्याग लोभ, तोष कर मन में
विद्या का अभिमान त्याग रे, भक्तिभाव में चित्त लगा रे
अन्तर्मन से श्याम पुकारे, दौड़े आये श्याम सँवारे
पूछें जब तक करे कमाई, वृद्ध हुआ सुधि ले नहीं कोई
आखिर अंत घड़ी भी आई, सारी उम्र व्यर्थ ही खोई
प्रतिदिन बीता साँझ सबेरा, जरा अवस्था ने आ घेरा
क्या करता यह तेरा मेरा, अपने मन को क्यों नहीं हेरा
विषय भोग में जीवन हारा, कर्तव्य जो भी कुछ नहीं विचारा
शव को देख डरे प्रिय दारा, झूठा है संसार पसारा
जगत् देखकर तू हरषाया, राग द्वेष में जीवन खोया
कृष्ण नाम को है बिसराया, अंत समय श्मशान में सोया
मानव जीवन है क्षण-भंगुर, फिर भी गर्व करे तन ऊपर
जन्म मरण का है यह चक्कर, करे शोक तू क्यों बिछुड़े पर
जो गंगा-जल कणिका पीता, कृष्णार्चन जीवन में करता
परहित में जो समय लगाता, यम से तो फिर क्यों कर डरता
गीता-ज्ञान हृदय में धरले, विष्णु-सहस्त्र नाम को जपले
गुरु-पद की जो सेवा करले, निश्चय ही भवसागर तर ले