Kali Nam Kam Taru Ram Ko

राम स्मरण
कलि नाम कामतरु राम को
दलनिहार दारिद दुकाल दुख, दोष घोर धन धाम को
नाम लेत दाहिनों होत मन वाम विधाता वाम को
कहत मुनीस महेस महातम, उलटे सूधे नाम को
भलो लोक – परलोक तासु जाके बल ललित – ललाम को
‘तुलसी’ जग जानियत नामते, सोच न कूच मुकाम को

Ram Kam Ripu Chap Chadhayo

धनुष भंग
राम कामरिपु चाप चढ़ायो
मुनिहि पुलक, आनंद नगर, नभ सुरनि निसान बजायो
जेहि पिनाक बिनु नाक किये, नृप सबहि विषाद बढ़ायो
सोई प्रभु कर परसत टूटयो, मनु शिवशंभु पढ़ायो
पहिराई जय माल जानकी, जुबतिन्ह मंगल गायो
‘तुलसी’ सुमन बरसि सुर हरषे, सुजसु तिहूँ पुर छायो

Jivan Ke Din Char Re Man Karo Punya Ke Kam

नाशवान संसार
जीवन के दिन चार रे, मन करो पुण्य के काम
पानी का सा बुदबुदा, जो धरा आदमी नाम
कौल किया था, भजन करूँगा, आन बसाया धाम
हाथी छूटा ठाम से रे, लश्कर करी पुकार
दसों द्वार तो बन्द है, निकल गया असवार
जैसा पानी ओस का, वैसा बस संसार
झिलमिल झिलमिल हो रहा, जात न लागे बार
मक्खी बैठी शहद पे, लिये पंख लपटाय
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, लालच बुरी बलाय