Ab To Nibhayan Saregi Rakh Lo Mhari Laj

शरणागति
अब तो निभायाँ सरेगी, रख लो म्हारी लाज
प्रभुजी! समरथ शरण तिहारी, सकल सुधारो काज
भवसागर संसार प्रबल है, जामे तुम ही जहाज
निरालम्ब आधार जगत्-गुरु, तुम बिन होय अकाज
जुग जुग भीर हरी भक्तन की, तुम पर उनको नाज
‘मीराँ’ सरण गही चरणन की, पत राखो महाराज

Rana Jimhe To Govind Ka Gun Gasyan

भक्ति भाव
राणाजी! म्हे तो गोविन्द का गुण गास्याँ
चरणामृत को नेम हमारे, नित उठ दरसण जास्याँ
हरि मंदिर में निरत करास्याँ, घूँघरिया धमकास्याँ
राम नाम का झाँझ चलास्याँ, भव सागर तर जास्याँ
यह संसार बाड़ का काँटा, सो संगत नहिं करस्याँ
‘मीराँ’ कहे प्रभु गिरिधर नागर, निरख परख गुण गास्याँ

Prem Ho To Shri Hari Ka

कृष्ण कीर्तन
प्रेम हो तो श्री हरि का प्रेम होना चाहिये
जो बने विषयों के प्रेमी उनपे रोना चाहिये
दिन बिताया ऐश और आराम में तुमने अगर
सदा ही सुमिरन हरि का करके सोना चाहिये
मखमली गद्दों पे सोये तुम यहाँ आराम से
वास्ते लम्बे सफर के कुछ बिछौना चाहिये
छोड़ गफलत को अरे मन, पायी जो गिनती की साँस
भोग और विषयों में फँस, इनको न खोना चाहिये
सब जगह बसते प्रभु पर, प्रेम बिन मिलते नहीं
कृष्ण-कीर्तन में लगा मन, मग्न होना चाहिये

Ab To Hari Nam Lo Lagi

चैतन्य महाप्रभु
अब तो हरी नाम लौ लागी
सब जग को यह माखन चोरा, नाम धर्यो बैरागी
कित छोड़ी वह मोहक मुरली, कित छोड़ी सब गोपी
मूँड मुँडाई डोरी कटि बाँधी, माथे मोहन टोपी
मात जसोमति माखन कारन, बाँधे जाके पाँव
श्याम किसोर भयो नव गौरा, चैतन्य जाको नाँव
पीताम्बर को भाव दिखावे, कटि कोपीन कसै
गौर कृष्ण की दासी ‘मीराँ’ रसना कृष्ण बसै

Rana Ji Ruthe To Mharo Kai Karsi

गोविंद का गान
राणाजी रूठे तो म्हारो काई करसी, मैं तो गोविन्द का गुण गास्याँ
राणाजी भले ही वाँको देश रखासी, मैं तो हरि रूठ्याँ कठे जास्याँ
लोक लाज की काँण न राखाँ मैं तो हरि-कीर्तन करास्याँ
हरि-मंदिर में निरत करस्याँ, मैं तो घुँघरिया घमकास्याँ
चरणामृत को नेम हमारो, मैं तो नित उठ दरसण जास्याँ
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, मैं तो भवसागर तिर जास्याँ

Vaishnav Jan To Tene Kahiye

वैष्णव जन (गुजराती)
वैष्णव जन तो तेणे कहिए, जे पीर पराई जाणे रे
परदुःखे उपकार करे तोये, मन अभिमान न आणे रे
सकल लोक मा सहुने वंदे, निंदा करे न केणी रे
वाच काज मन निश्चल राखे, धन धन जननी तेणी रे
समदृष्टि ने, तृष्णा त्यागी, पर-स्त्री जेणे मात रे
जिह्वा थकी असत्य न बोले, पर धन झाले न हाथ रे
माया मोह न व्यापे जेणे, दृढ़ वैराग जेणा मन माँ रे
रामनाम शुँ ताली लागी, सकल तीरथ तेना तन माँ रे
निर्लोभी ने कपट रहित छे, काम क्रोध निरवार्या रे
‘नरसैयो’ तेनुँ दरसन करताँ, कुल एकोतेर तार्या रे

Aeri Main To Darad Diwani

विरह व्यथा
ऐरी मैं तो दरद दिवानी, मेरो दरद न जाने कोय
घायल की गति घायल जाने, जो कोई घायल होय
जोहरी की गति जोहरी जाने, जो कोई जोहरी होय
सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण किस विध होय
गगन मँडल पर सेज पिया की, किस विध मिलणा होय
दरद की मारी बन-बन डोलूँ, वैद मिल्यो नहिं कोय
‘मीराँ’ की प्रभु पीर मिटेगी, जो वैद साँवरो होय

Shyam Main To Thare Rang Rati

श्याम से प्रीति
स्याम मैं तो थाँरे रँग राती
औराँ के पिय परदेस बसत हैं, लिख लिख भेजे पाती
मेरा पिया मेरे हिरदे बसत है, याद करूँ दिन राती
भगवा चोला पहिर सखीरी, मैं झुरमट रमवा जाती
झुरमुट मे मोहिं मोहन मिलिया, उण से नहिं सरमाती
और सखी मद पी पी माती, बिन पिये मैं मदमाती
प्रेम भट्ठी को मद पीयो ‘मीराँ’, छकी फिरै दिन राती

Payo Ji Mhe To Ram Ratan Dhan Payo

हरि भक्ति
पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो
वास्तु अमोलक दी म्हाने सतगुरु, किरपा कर अपनायो
जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो
खरच न हौवे, चोर न लेवै, दिन दिन बढ़त सवायो
सत की नाव केवटिया सतगुरु, भव-सागर तर आयो
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरख हरख जस गायो

Ham To Ek Hi Kar Ke Mana

आत्म ज्ञान
हम तो एक ही कर के माना
दोऊ कहै ताके दुविधा है, जिन हरि नाम न जाना
एक ही पवन एक ही पानी, आतम सब में समाना
एक माटी के लाख घड़े है, एक ही तत्व बखाना
माया देख के व्यर्थ भुलाना, काहे करे अभिमाना
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, हम हरि हाथ बिकाना