Jo Ham Bhale Bure To Tere

शरणागति
जो हम भले-बुरे तो तेरे
तुमहिं हमारी लाज बड़ाई, विनती सुनु प्रभु मेरे
सब तजि तव सरनागत आयो, निज कर चरन गहे रे
तव प्रताप बल बदत न काहू, निडर भये घर चेरे
और देव सब रंक भिखारी, त्यागे बहुत अनेरे
‘सूरदास’ प्रभु तुम्हरि कृपा ते, पाये सुख जु घनेरे

Jiv Bas Ram Nam Japna

हरिनाम स्मरण
जीव बस राम नाम जपना, जरा भी मत करना फिकरी
भाग लिखी सो हुई रहेगी, भली बुरी सगरी
ताप करके हिरणाकुश राजा, वर पायो जबरी
लौह लकड़ से मार्यो नाहीं, मर्यौ मौत नख री
तीन लोक ककी माता सीता, रावण जाय हरी
जब लक्षमण ने करी चढ़ाई, लंका गई बिखरी
आठों पहर राम को रटना, ना करना जिकरी
कहत ‘ कबीर’ सुनो भाई साधो, रहना बिन फिकरी

Moko Kahan Dhundhe Re Bande

आत्मज्ञान
मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में
ना मंदिर में ना मस्जिद में, ना पर्वत के वास में
ना जप ताप में, ना ही योग में, ना मैं व्रत उपवास में
कर्म काण्ड में मैं नहीं रहता, ना ही मैं सन्यास में
खोज होय साँची मिल जाऊँ, इक पल की ही तलाश में
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, मैं तो हूँ विश्वास में

Jagat Main Jivan Do Din Ka

नश्वर संसार
जगत् में जीवन दो दिन का
पाप कपट कर माया जोड़ी, गर्व करे धन का
सभी छोड़कर चला मुसाफिर, वास हुआ वन का
सुन्दर काया देख लुभाया, लाड़ करे इसका
श्वास बन्द हो बिखरे देही, ज्यों माला मनका
यह संसार स्वप्न की माया, मिलना कुछ दिन का
‘ब्रह्मानंद’ भजन कर ले तूँ, जपो नाम हरि का

Aatma Ka Bhojan Prarthana

प्रार्थना
आत्मा का भोजन प्रार्थना, भूले नहीं, प्रतिदिन करें
अन्तःकरण से प्रार्थना, सब शोक चिन्ता को हरें
जीवन में सच्ची शांति सुख, प्रभु प्रार्थना से प्राप्त हो
दत्त चित्त हो प्रार्थना करें, प्रतीति निश्चित सुलभ हो
मीराँ के मन में प्रेम था, तो विष भी अमृत हो गया
निष्काम होए प्रार्थना, समझो प्रभु ने सुन लिया
अध्यात्म की गहराइयों में, डूब कर हो प्रार्थना
हो भाव मन में समर्पण का, वरना तो मात्र प्रवंचना 

Karo Ab Jaane Ki Taiyari

चेतावनी
करो अब जाने की तैयारी
साधु संत सम्राट भी जायें, जाते सब संसारी
देह तुम्हारी लगी काँपने, अंत काल की बारी
ईर्ष्या द्वेष अहं नहीं छूटे, उम्र बिता दी सारी
मोह जाल में फँसा रहे मन, वह है व्यक्ति अनारी
काम न आये कोई अन्ततः, फिर भी दुनियादारी
खाते, चलते सभी समय बस, जपलो कृष्ण मुरारी

Garharsthya Dharma Sarvottam Hi

गृहस्थ जीवन
गार्हस्थ्य धर्म सर्वोत्तमही
इन्द्रिय-निग्रह व सदाचार, अरु दयाभाव स्वाभाविक ही
सेवा हो माता पिता गुरु की, परिचर्या प्रिय पति की भी हो
ऐसे गृहस्थी पर तो प्रसन्न, निश्चय ही पितर देवता हो
हो साधु, संत, सन्यासी के, जीवनयापन का भी अधार
जहाँ सत्य, अहिंसा, शील तथा, सद्गुण का भी निश्चित विचार

Jiwan Swayam Ka To Malin

पाखण्ड
जीवन स्वयं का तो मलिन, उत्सुक हमें उपदेश दे
यह तो विरोधाभास है उनमें अहं भरपूर है
अन्त:करण से तो कुटिल, सत्कर्म का पर ज्ञान दे
यह ढोंगियों का आचरण, विश्वास उस पर क्यों करें
जो भक्ति का प्रतिरोध करते, मुक्ति का निर्देश दे
अनभिज्ञ वे तो शास्त्र से, सद्ज्ञान से कोसो परे
साधन भजन करते नहीं, संसार-सुख में ही फँसे
बातें करे वेदान्त की, वे तो उपेक्षा योग्य है
कर्तव्य यह कलिकाल में, सत्संग व स्वाध्याय हो
इस भाँति सद्गुण हो सुलभ, सत्कर्म ही सन्मार्ग है

Trashna Hi Dukh Ka Karan Hai

तृष्णा
तृष्णा ही दुःख का कारण है
इच्छाओं का परित्याग करे, संतोष भाव आ जाता है
धन इतना ही आवश्यक है जिससे कुटंब का पालन हो
यदि साधु सन्त अतिथि आये, उनका भी स्वागत सेवा हो
जो सुलभ हमें सुख स्वास्थ्य कीर्ति, प्रारब्ध भोग इसको कहते
जो झूठ कपट से धन जोड़ा, फलस्वरूप अन्ततः दुख सहते
उसकी रक्षा की चिन्ता हो, कुछ भी तो साथ नहीं जाता
सत्कर्म किया हो जीवन में, सद्भाव काम में तब आता 

Nishchint Huve Baithe Na Raho

प्रबोधन
निश्चिंत हुए बैठे न रहो
शाश्वत जीवन यहाँ किसका है, पैदा होए वे मरते भी
दिन कभी एक से नहीं रहे, इसका विचार तुम करो अभी
जब जन्म दिवस आता है तो, खुशियाँ सब लोग मनाते हैं
कम वर्ष हो गये जीवन के, समझे जो नहीं पछताते हैं