Sakhi Meri Nind Nasani Ho

विरह व्यथा
सखी, मेरी नींद नसानी हो
पिव को पंथ निहारत सिगरी, रैण बिहानी हो
सखियन मिल कर सीख दई मन, एक न मानी हो
बिन देख्याँ कल नाहिं पड़त, जिय ऐसी ठानी हो
अंग-अंग व्याकुल भये मुख ते, पिय पिय बानी हो
अंतर-व्यथा विरह की कोई, पीर न जानी हो
चातक जैहि विधि रटे मेघ कूँ, मछली जिमि पानी हो
‘मीराँ’ अति अधीर विरहिणी, सुध-बुध बिसरानी हो

Ab Lo Nasani

भजन के पद
शुभ संकल्प
अब लौं नसानी, अब न नसैंहौं
राम-कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैंहौं
पायउँ नाम चारु चिंतामनि, उर करतें न खसैंहौं
श्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैंहौं
परबस जानी हँस्यो इन इंद्रिन, निज बस ह्वै न हँसैंहौं
मन मधुकर पन करके ‘तुलसी’, रघुपति पद-कमल बसैंहौं