Jake Priy Na Ram Vedehi

राम-पद-प्रीति
जाके प्रिय न राम वैदेही
तजिये ताहि कोटि बैरीसम, जद्यपि परम सनेही
तज्यो पिता प्रह्लाद, विभीषन बंधु, भरत महतारी
बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज – बनितनि, भये मुद – मंगलकारी
नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं
अंजन कहाँ आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं
‘तुलसी’ सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रान ते प्यारो
जासों होइ सनेह राम – पद, एतो मतो हमारो

Priy Putra Parvati Maiya Ke

श्री गणेश वंदना
प्रिय पुत्र पार्वती मैया के, गज-वदन विनायक विघ्न हरे
जो ऋद्धि सिद्धि दाता सेवित, संताप शोक को दूर करे
जामुन कपित्थ जैसे फल का, रुचि पूर्वक भोग लगाते हैं
मोदक के लड्डू जिनको प्रिय, सारे जग का हित करते हैं
सम्पूर्ण यज्ञ के जो रक्षक, कर में जिनके पाशांकुश है
है रक्त वर्ण जिनके तन का, मूषक जिनका प्रिय वाहन है
हे वक्रतुण्ड! हे लम्बोधर! मंगल दाता! सब विघ्न हरो
शत शत प्रणाम मैं करूँ प्रभो, मनवांछित कारज पूर्ण करो