Prabhu Ji The To Chala Gaya Mhara Se Prit Lagay

पविरह व्यथा
प्रभुजी थें तो चला गया, म्हारा से प्रीत लगाय
छोड़ गया बिस्वास हिय में, प्रेम की बाती जलाय
विरह जलधि में छोड़ गया थें, नेह की नाव चलाय
‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, तुम बिन रह्यो न जाय

The To Aarogo Ji Madan Gopal

दुग्ध अर्पण
थे तो आरोगोजी मदनगोपाल! कटोरो ल्याई दूध को भर्यो
दूधाजी दीनी भोलावण, जद में आई चाल
धोली गाय को दूध गरम कर, ल्याई मिसरी घाल
कईयाँ रूठ गया हो म्हारा नाथ! कटोरो….
कद ताई रूठ्या रोगा थे बोलो जी महाराज
दूध-कटोरो धर्यो सामने, पीवणरी काँई लाज
भूखा मरता तो चिप जासी थारा चिकणा गाल! कटोरो…
श्याम सलोना दूध आरोगो, साँची बात सुनाऊँ
बिना पियाँ यो दूध-कटोरो, पाछो ले नहीं जाऊँ
देस्यूँ साँवरिया चरणा में देही त्याग! कटोरो
करुण भरी विनती सुण प्रभुजी, लियो कटोरो हाथ
गट-गट दूध पिवण ने लाग्या, भक्त जणारा नाथ
थे तो राखो हो भगताँ री जाती लाज! कटोरो…

Mai Ri Main To Liyo Govind Mol

अनमोल गोविंद
माई री मैं तो लियो री गोविन्दो मोल
कोई कहै छाने, कोई कहै चोरी, लियो री बजंताँ ढोल
कोई कहै कारो, कोई कहै गोरो, लियो री अखियाँ खोल
कोई कहै महँगो कोई कहै सस्तो, लियो री अमोलक मोल
तन का गहणाँ सब ही दीना, दियो री बाजूबँद खोल
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, पुरब जनम को कोल

Prabhu Ji Main To Tharo Hi Tharo

समर्पण (राजस्थानी)
प्रभुजी मैं तो थारो ही थारो
भलो बुरो जैसो भी हूँ मैं, पर हूँ तो बस थारो
बिगड्यो भी तो थारो बिगड्यो, थे ही म्हने सुधारो
म्हारी बात जाय तो जाये, नाम बिगड़ सी थारो
चाहे कहे म्हने तो बिगडी, विरद न रहसी थारो
जँचे जिस तरे करो नाथ, थे मारो चाहे तारो  

Mere To Giridhar Gopal

गिरिधर गोपाल
मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई
जाके सिर मोर –मुकुट, मेरो पति सोई
छाँड़ि दई कुल की कानि, कहा करि है कोई
संतन ढिग बैठि-बैठि, लोक लाज खोई
अँसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेली बोई
अब तो बेल फैल गई, आनँद फल होई
दही की मथनिया, बड़े प्रेम से बिलोई
माखन सब काढ़ि लियो, छाछ पिये कोई
भगत देखि राजी भई, जगत देखि रोई
दासी ‘मीराँ’ लाल गिरिधर, तारो अब मोही

Prem Ho To Shri Hari Ka

कृष्ण कीर्तन
प्रेम हो तो श्री हरि का प्रेम होना चाहिये
जो बने विषयों के प्रेमी उनपे रोना चाहिये
दिन बिताया ऐश और आराम में तुमने अगर
सदा ही सुमिरन हरि का करके सोना चाहिये
मखमली गद्दों पे सोये तुम यहाँ आराम से
वास्ते लम्बे सफर के कुछ बिछौना चाहिये
छोड़ गफलत को अरे मन, पायी जो गिनती की साँस
भोग और विषयों में फँस, इनको न खोना चाहिये
सब जगह बसते प्रभु पर, प्रेम बिन मिलते नहीं
कृष्ण-कीर्तन में लगा मन, मग्न होना चाहिये

Main To Giridhar Aage Nachungi

समर्पण
मैं तो गिरिधर आगे नाचूँगी
नाच नाच मैं पिय को रिझाऊँ, प्रेमी जन को जाचूँगी
प्रेम प्रीति के बाँध घुँघरूँ, सुरति की कछनी काछूँगी
लोक लाज कुल की मर्यादा, या मैं एक न राखूँगी
पिया के चरणा जाय पडूँगी, ‘मीराँ’ हरि रँग राचूँगी

Vaishnav Jan To Tene Kahiye

वैष्णव जन (गुजराती)
वैष्णव जन तो तेणे कहिए, जे पीर पराई जाणे रे
परदुःखे उपकार करे तोये, मन अभिमान न आणे रे
सकल लोक मा सहुने वंदे, निंदा करे न केणी रे
वाच काज मन निश्चल राखे, धन धन जननी तेणी रे
समदृष्टि ने, तृष्णा त्यागी, पर-स्त्री जेणे मात रे
जिह्वा थकी असत्य न बोले, पर धन झाले न हाथ रे
माया मोह न व्यापे जेणे, दृढ़ वैराग जेणा मन माँ रे
रामनाम शुँ ताली लागी, सकल तीरथ तेना तन माँ रे
निर्लोभी ने कपट रहित छे, काम क्रोध निरवार्या रे
‘नरसैयो’ तेनुँ दरसन करताँ, कुल एकोतेर तार्या रे

Main To Tore Charan Lagi Gopal

शरणागत
मैं तो तोरे चरण लगी गोपाल
जब लागी तब कोउ न जाने, अब जानी संसार
किरपा कीजौ, दरसण दीजो, सुध लीजौ तत्काल
‘मीराँ’ कहे प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कमल बलिहार

Main To Mohan Rup Lubhani

रूप लुभानी
मैं तो मोहन रूप लुभानी
सुंदर वदन कमल-दल लोचन, चितवन की मुसकानी
जमना के नीर तीरे धेनु चरावै, मुरली मधुर सुहानी
तन मन धन गिरिधर पर वारूँ, ‘मीराँ’ पग लपटानी