Aaj Sakhi Shyam Sundar

मुरली का जादू
आज सखी श्याम सुंदर बाँसुरी बजाये
मोर-मुकुट तिलक भाल, पग में नूपुर सुहाये
बिम्बाधर मुरलीधर, मधुर धुन सुनाये
यमुना को रुकत नीर, पक्षीगण मौन भये
धेनू मुख घास डार, धुनि में मन लाये
त्रिभुवन में गूँज उठी, मुरली की मधुर तान
समाधि भी गई टूट, योगी मन भाये
बंशी-स्वर सुन अपार, भूले मुनि मन विचार
‘ब्रह्मानंद’ गोपीजन, तन सुधि बिसराये

Man Le Manwa Murakh Tu

सीख
मान ले मनवा मूरख तू, अब तो भज नाम निंरजन का
माँ-उदर में जिसने पेट भरा, अब पेट के काज तू क्यों भटके
दुनियाँ का पोषण जो करता, वह पालनहार तेरे तन का
ये मात-पिता, भाई-बंधु, बेटा अरु, माल मकान सभी
कोई वस्तु नहीं स्थिर है यहाँ, करले तू काम भलाई का
ये काल कराल फिरे सिर पे, घर-बार सभी रह जाय यहीं
‘ब्रह्मानंद’ विचार करो कुछ तो, कर ध्यान सदा भव-भंजन का

Udho Vo Sanwari Chavi Ne

विरथ व्यथा
उधो वो साँवरी छवि ने, हमारा दिल चुराया है
बजाकर बाँसुरी मीठी, सुनाकर गीत गोविन्द ने
रचाकर रास कुंजन में, प्रेम हमको लगाया है
छोड़ कर के हमें रोती, बसे वो मधुपुरी जाकर
खबर भी ली नहीं फिर के, हमें दिल से भुलाया है
हमारा हाल जाकर के, सुनाना श्यामसुन्दर को
वो ‘ब्रह्मानन्द’ मोहन रूप को, मन में बसाया हैकर्म विपाक
काहे को सोच करे मनवा तू, भाग्य लिखा सो होता प्यारे
होनहार कोई मेट न पाये, कोटि यतन करके सब हारे
हरिश्चन्द्र, श्रीराम, युधिष्ठिर, राज्य छोड़ वनवास सिधारे
जैसी करनी वैसी भरनी, शत्रु न मित्र न कोई हमारे
‘ब्रह्मानंद’ सुमिर जगदीश्वर, क्लेश दुःख विपदा को टारें

Laga Le Prem Prabhu Se Tu

शरणागति
लगाले प्रेम प्रभु से तू, अगर जो मोक्ष चाहता है
रचा उसने जगत् सारा, पालता वो ही सबको है
वही मालिक है दुनियाँ का, पिता माता विधाता है
नहीं पाताल के अंदर, नहीं आकाश के ऊपर
सदा वो पास है तेरे, ढूँढने क्यों तू जाता है
पड़े जो शरण में उसकी, छोड़ दुनियाँ के लालच को
वो ‘ब्रह्मानन्द’ निश्चय ही, परम सुख-धाम पाता है

Jagat Main Jivan Do Din Ka

नश्वर संसार
जगत् में जीवन दो दिन का
पाप कपट कर माया जोड़ी, गर्व करे धन का
सभी छोड़कर चला मुसाफिर, वास हुआ वन का
सुन्दर काया देख लुभाया, लाड़ करे इसका
श्वास बन्द हो बिखरे देही, ज्यों माला मनका
यह संसार स्वप्न की माया, मिलना कुछ दिन का
‘ब्रह्मानंद’ भजन कर ले तूँ, जपो नाम हरि का

Vrindavan Kunj Bhawan

नाचत गिरधारी
वृंदावन कुंज भवन, नाचत गिरिधारी
धर-धर धर मुरलि अधर, भर-भर स्वर मधुर अधर
कर-कर नटवर स्वरूप, सुंदर सुखकारी
घन-घन घन बजत ताल, ठुम-ठुम ठुम चलत चाल
चरणन छन छन छन छन, नूपुर धुन प्यारी
घिर, घिर, घिर करत गान, फिर फिर फिर देत तान
मिल, मिल, मिल रचत रास, संग गोप नारी
चम, चम, चम वदन चंद, हँस, हँस, हँस, हँसन मंद
‘ब्रह्मानंद’ नंद-नँदन, जाऊँ बलिहारी

Jagat Main Jivan Hai Din Char

सदुपदेश
जगत में जीवन है दिन चार
खरी कमाई से ही भोगो, किंचित सुख संसार
मात-पिता गुरुजन की सेवा, कीजै पर उपकार
पशु पक्षी जड़ सब के भीतर, ईश्वर अंश निहार
द्वेष भाव मन से बिसराओ, करो प्रेम व्यवहार
‘ब्रह्मानंद’ तोड़ भव-बंधन, यह संसार असार

Shankar Teri Jata Main Shamil Hai Gang Dhara

शिवशंकर
शंकर तेरी जटा में शोभित है गंग-धारा
काली घटा के अंदर, चपला का ज्यों उजारा
गल मुण्डमाल राजे, शशि शीश पर बिराजे
डमरू निनाद बाजे, कर में त्रिशूल साजे
मृग चर्म वसन धारी, नंदी पे हो सवारी
भक्तों के दुःख हारी, गिरिजा के सँग विहारी
शिव नाम जो उचारे, सब पाप दोष जारे
भव-सिंधु से ‘ब्रह्मानंद’, उस पार शिव उतारे

Jay Kamala He Mahalakshmi

महालक्ष्मी स्तवन
जय कमला हे महालक्ष्मी जय, सकल जगत माता सुखदाई
रत्न मुकुट मस्तक पर राजै, चन्द्रहार गल शोभा पाई
कानन में कुंडल, कर कंकण, पग नूपुर झँकार सुहाई
गरुड़ चढ़ी हरि संग विराजे, शेषनाग तन सेज बिछाई
‘ब्रह्मानंद’ करे जो सुमिरन, सुख संपति हो जाय सवाई

Satsang Kare Jo Jivan Main

शिव स्तवन
सत्संग करे जो जीवन में, हो जाये बेड़ा पार
काशी जाये मधुरा जाये, चाहे न्हाय हरिद्वार
चार धाम यात्रा कर आये, मन में रहा विकार
बिन सत्संग ज्ञान नहीं उपजे, हो चाहे यत्न हजार
‘ब्रह्मानंद’ मिले जो सदगुरु, हो अवश्य उद्धार