Radha Ghar Kanan Main Radha

जीवन सर्वस्व राधा
राधा घर, कानन में राधा, राधा नित यमुना के तीर
राधा मोद, प्रमोद राधिका, राधा बहै नयन बन नीर
राधा प्राण बुद्धि सब राधा, राधा नयनों की तारा
राधा ही तन मन में छाई, प्रेमानंद सुधा धारा
राधा भजन, ध्यान राधा ही, जप तप यज्ञ सभी राधा
राधा सदा स्वामिनी मेरी, परमाराध्या श्रीराधा

Prabhu Tera Paar Na Paya

शरणागत
प्रभु तेरा पार न पाया
तूँ सर्वज्ञ चराचर सब में, तू चैतन्य समाया
प्राणी-मात्र के तन में किस विधि, तू ही तो है छाया
जीव कहाँ से आये जाये, कोई समझ न पाया
सूर्य चन्द्रमा तारे सब में, ज्योति रूप चमकाया
यह सृष्टि कैसी विचित्र है, उसमें मैं भरमाया
‘ब्रह्मानंद’ शरण में तेरी, छोड़ कुटुंबी आया

Vando Shri Radha Charan

युगल स्वरूप झाँकी
वन्दौं श्री राधाचरन, पावन परम उदार
भय विषाद अज्ञानहर, प्रेम भक्ति दातार
रास-बिहारिनि राधिका, रासेश्वर नँद-लाल
ठाढ़े सुंदरतम परम, मंडल रास रसाल
मधुर अधर मुरली धरे, ठाढ़े स्याम त्रिभंग
राधा उर उमग्यौ सु-रस रोमांचित अँग-अंग
विश्वविमोहिनी श्याम की, मनमोहिनि रसधाम
श्याम चित्त उन्मादिनी, राधा नित्य ललाम
परम प्रेम-आनंदमय, दिव्य जुगल रस-रूप
कालिंदी-तट कदँब-तल, सुषमा अमित अनूप
सुधा-मधुर-सौंदर्य निधि, छलकि रहे अँग-अँग
उठत ललित पलपल विपुल, नव नव रूप तरंग
स्याम स्वामिनी राधिके! करौ कृपा को दान
सुनत रहैं मुरली मधुर, मधुमय बानी कान
करौ कृपा श्री राधिका! बिनवौं बारम्बार
बनी रहे स्मृति मधुर, मंगलमय सुखसार

Priti Ki Rit Na Jane Sakhi

प्रीति की रीति
प्रीति की रीत न जाने सखी, वह नन्द को नन्दन साँवरिया
वो गायें चराये यमुना तट, और मुरली मधुर बजावत है
सखियों के संग में केलि करे, दधि लूटत री वह नटवरिया
संग लेकर के वह ग्वाल बाल, मग रोकत है ब्रज नारिन को
तन से चुनरी-पट को झटके, सिर से पटके जल गागरिया
वृन्दावन की वह कुंजन में, गोपिन के संग में रास रचे
पग नुपूर की धुन बाज रही, नित नाचत है मन-मोहनिया
जो भक्तों के सर्वस्व श्याम, ब्रज में वे ही तो विहार करें
‘ब्रह्मानंद’ न कोई जान सके, वह तीनों लोक नचावनिया

Shyam Ne Kaha Thagori Dari

श्याम की ठगौरी
स्याम ने कहा ठगोरी डारी
बिसरे धरम-करम, कुल-परिजन, लोक साज गई सारी
गई हुती मैं जमुना तट पर, जल भरिबे लै मटकी
देखत स्याम कमल-दल-लोचन, दृष्टि तुरत ही अटकी
मो तन मुरि मुसुकाए मनसिज, मोहन नंद-किसोर
तेहि छिन चोरि लियौ मन सरबस, परम चतुर चित-चोर

Brajraj Aaj Pyare Meri Gali Me Aana

श्याम का सौन्दर्य
ब्रजराज आज प्यारे मेरी गली में आना
तेरी छबि मनोहर मुझको झलक दिखाना
सिर मोर मुकुट राजे, बनमाल उर बिराजे
नूपुर चरण में बाजे, कर में कड़ा सुहाना
कुंडल श्रवण में सोहे, बंसी अधर धरी हो
तन पीत वसन शोभे, कटि मेखला सजाना
विनती यही है प्यारे, सुन नंद के दुलारे
‘ब्रह्मानंद’ आके तुमको, मन की तपन बुझाना

Aaj Sakhi Shyam Sundar

मुरली का जादू
आज सखी श्याम सुंदर बाँसुरी बजाये
मोर-मुकुट तिलक भाल, पग में नूपुर सुहाये
बिम्बाधर मुरलीधर, मधुर धुन सुनाये
यमुना को रुकत नीर, पक्षीगण मौन भये
धेनू मुख घास डार, धुनि में मन लाये
त्रिभुवन में गूँज उठी, मुरली की मधुर तान
समाधि भी गई टूट, योगी मन भाये
बंशी-स्वर सुन अपार, भूले मुनि मन विचार
‘ब्रह्मानंद’ गोपीजन, तन सुधि बिसराये

Man Le Manwa Murakh Tu

सीख
मान ले मनवा मूरख तू, अब तो भज नाम निंरजन का
माँ-उदर में जिसने पेट भरा, अब पेट के काज तू क्यों भटके
दुनियाँ का पोषण जो करता, वह पालनहार तेरे तन का
ये मात-पिता, भाई-बंधु, बेटा अरु, माल मकान सभी
कोई वस्तु नहीं स्थिर है यहाँ, करले तू काम भलाई का
ये काल कराल फिरे सिर पे, घर-बार सभी रह जाय यहीं
‘ब्रह्मानंद’ विचार करो कुछ तो, कर ध्यान सदा भव-भंजन का

Udho Vo Sanwari Chavi Ne

विरथ व्यथा
उधो वो साँवरी छवि ने, हमारा दिल चुराया है
बजाकर बाँसुरी मीठी, सुनाकर गीत गोविन्द ने
रचाकर रास कुंजन में, प्रेम हमको लगाया है
छोड़ कर के हमें रोती, बसे वो मधुपुरी जाकर
खबर भी ली नहीं फिर के, हमें दिल से भुलाया है
हमारा हाल जाकर के, सुनाना श्यामसुन्दर को
वो ‘ब्रह्मानन्द’ मोहन रूप को, मन में बसाया हैकर्म विपाक
काहे को सोच करे मनवा तू, भाग्य लिखा सो होता प्यारे
होनहार कोई मेट न पाये, कोटि यतन करके सब हारे
हरिश्चन्द्र, श्रीराम, युधिष्ठिर, राज्य छोड़ वनवास सिधारे
जैसी करनी वैसी भरनी, शत्रु न मित्र न कोई हमारे
‘ब्रह्मानंद’ सुमिर जगदीश्वर, क्लेश दुःख विपदा को टारें

Laga Le Prem Prabhu Se Tu

शरणागति
लगाले प्रेम प्रभु से तू, अगर जो मोक्ष चाहता है
रचा उसने जगत् सारा, पालता वो ही सबको है
वही मालिक है दुनियाँ का, पिता माता विधाता है
नहीं पाताल के अंदर, नहीं आकाश के ऊपर
सदा वो पास है तेरे, ढूँढने क्यों तू जाता है
पड़े जो शरण में उसकी, छोड़ दुनियाँ के लालच को
वो ‘ब्रह्मानन्द’ निश्चय ही, परम सुख-धाम पाता है