Janak Mudit Man Tutat Pinak Ke

धनुष भंग
जनक मुदित मन टूटत पिनाक के
बाजे हैं बधावने, सुहावने सुमंगल-गान
भयो सुख एकरस रानी राजा राँक के
दुंदभी बजाई, सुनि हरषि बरषि फूल
सुरगन नाचैं नाच नाय कहू नाक के
‘तुलसी’ महीस देखे दिन रजनीस जैसे
सूने परे सून से, मनो मिटाय आँक के

Mangal Murati Marut Nandan

मारुति वंदना
मंगल-मूरति मारुत-नंदन, सकल अमंगल-मूल-निकंदन
पवन-तनय संतन-हितकारी, ह्रदय बिराजत अवध-बिहारी
मातु-पिता, गुरु, गनपति, सारद, सिवा-समेत संभु,सुक नारद
चरन बंदि बिनवौं सब काहू, देहु राम-पद-नेह-निबाहू
बंदौं राम-लखन वैदेही, जे ‘तुलसी’ के परम सनेही

Abki Tek Hamari, Laj Rakho Girdhari

शरणागति
अबकी हमारी, लाज राखो गिरिधारी
जैसी लाज राखी अर्जुन की, भारत-युद्ध मँझारी
सारथि होके रथ को हाँक्यो, चक्र सुदर्शन धारी
भक्त की टेक न टारी
जैसी लाज राखी द्रोपदी की, होन न दीनि उघारी
खेंचत खेंचत दोउ भुज थाके, दुःशासन पचि हारी
चीर बढ़ायो मुरारी
सूरदास की लज्जा राखो, अब को है रखवारी
राधे राधे श्रीवर प्यारी, श्री वृषभानु-दुलारी
शरण मैं आयो तिहारी

Kari Gopal Ki Hoi

प्रारु
करी गोपाल की होई
जो अपनौं पुरुषारथ मानत, अति झूठौ है सोई
साधन, मंत्र, जंत्र, उद्यम, बल, ये सब डारौ धोई
जो कछु लिखि राखी नँदनंदन, मेटि सकै नहिं कोई
दुख-सुख लाभ-अलाभ समुझि तुम, कतहिं मरत हौ रोई
‘सूरदास’ स्वामी करुनामय, स्याम चरन मन पोई

Gopiyan Aai Nand Ke Dware

होली
गोपियाँ आईं नन्द के द्वारे
खेलत फाग बसंत पंचमी, पहुँचे नंद-दुलारे
कोऊ अगर कुमकुमा केसर, काहू के मुख पर डारे
कोऊ अबीर गुलाल उड़ावे, आनँद तन न सँभारे
मोहन को गोपी निरखत सब, नीके बदन निहारे
चितवनि में सबही बस कीनी, मनमोहन चित चोरे
ताल मृदंग मुरली दफ बाजे, झाँझर की झन्कारे
‘सूरदास’ प्रभु रीझ मगन भये, गोप वधू तन वारे

Ja Din Man Panchi Udi Jehain

देह का गर्व
जा दिन मन पंछी उड़ि जैहैं
ता दिन तेरे तन तरुवर के, सबै पात झरि जैहैं
या देही की गरब न करियै, स्यार, काग, गिध खैहैं
‘सूरदास’ भगवंत भजन बिनु, वृथा सु जनम गँवैंहैं

Dadhi Bechati Braj Galini Fire

प्रेमानुभूति
दधि बेचति ब्रज-गलिनि फिरै
गोरस लैन बुलावत कोऊ, ताकी सुधि नैकौ न करै
उनकी बात सुनति नहिं स्रवनन, कहति कहा ए घरनि जरै
दूध, दही ह्याँ लेत न कोऊ, प्रातहि तैं सिर लिऐं ररै
बोलि उठति पुनि लेहु गुपालै, घर-घर लोक-लाज निदरै
‘सूर’ स्याम कौ रूप महारस, जाकें बल काहू न डरै

Naina Bhaye Anath Hamare

विरह व्यथा
नैना भये अनाथ हमारे
मदनगुपाल यहाँ ते सजनी, सुनियत दूरि सिधारे
वै हरि जल हम मीन बापुरी, कैसे जियहिं नियारे
हम चातक चकोर श्यामल घन, बदन सुधा-निधि प्यारे
मधुबन बसत आस दरसन की, नैन जोई मग हारे
‘सूरदास’ ऐसे मनमोहन, मृतक हुते पुनि मारे

Biharat Ras Rang Gopal

रास लीला
बिहरत रास रंग गोपाल
नवल स्यामहि संग सोभित, नवल सब ब्रजबाल
सरद निसि अति नवल उज्जवल, नव लता बन धाम
परम निर्मल पुलिन जमुना, कलपतरु विश्राम
कोस द्वादस रास परिमिति, रच्यो नंदकुमार
‘सूर’ प्रभु सुख दियो निसि रमि, काम कौतुक हार

Main Ik Nai Bat Sun Aai

श्री कृष्ण प्राकट्य
मैं इक नई बात सुन आई
महरि जसोदा ढोटा जायौ, घर घर होति बधाई
द्वारैं भीर गोप-गोपिन की, महिमा बरनि न जाई
अति आनन्द होत गोकुल में, रतन भूमि सब छाई
नाचत वृद्ध, तरुन अरु बालक, गोरस कीच मचाई
‘सूरदास’ स्वामी सुख-सागर, सुन्दर स्याम कन्हाई