Sune Ri Maine Nirbal Ke Balram

शरणागति
सुने री मैंने निरबल के बल राम
पिछली साख भरूँ संतन की, आइ सँवारे काम
जब लगि गज बल अपनो बरत्यो, नेक सर्यो नहिं काम
निरबल ह्वै हरि नाम पुकार्यो, आये आधे नाम
द्रुपद-सुता निरबल भई ता दिन, तजि आये निज धाम
दुःशासन की भुजा थकित भई, बसन रूप भये स्याम
अप-बल, तप-बल और बाहु बल, चौथो है बल दाम
‘सूर’ किसोर कृपा तें सब बल, हारे को हरि नाम

Hari Hari Hari Hari Sumiran Karo

नाम स्मरण
हरि हरि हरि हरि सुमिरन करौ, हरि-चरनार-विंद उर धरौ
हरि की कथा होइ जब जहाँ, गंगा हूँ चलि आवै तहाँ
जमुना सिन्धु सरस्वति आवैं, गोदावरी विलम्ब न लावैं
सर्व-तीर्थ को वासा तहाँ, ‘सूर’ हरि-कथा होवै जहाँ

Chalan Vahi Des Pritam Chalan Vahi Des

प्रीतम के देश
चालाँ वाही देस प्रीतम, चालाँ वाही देस
कहो कसूमल साड़ी रँगावाँ, कहो तो भगवाँ भेस
कहो तो मोतियाँ माँग भरावाँ, कहो बिखरावाँ केस
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, सुण लो बिरद नरेस

Dekhat Shyam Hase

सुदामा से भेंट
देखत श्याम हँसे, सुदामा कूँ देखत श्याम हँसे
फाटी तो फुलड़ियाँ पाँव उभाणे, चलताँ चरण घसे
बालपणे का मीत सुदामा, अब क्यूँ दूर बसे
कहा भावज ने भेंट पठाई, ताँदुल तीन पसे
कित गई प्रभु मेरी टूटी टपरिया, माणिक महल लसे
कित गई प्रभु मेरी गउअन बछियाँ, द्वार पे सब ही हँसे
‘मीराँ’ के प्रभु हरि अविनासी, सरणे तोरे बसे

Barse Badariya Sawan Ki

प्रतीक्षा
बरसे बदरिया सावन की, सावन की मनभावन की
सावन में उमग्यो मेरो मनवा, भनक सुनी हरि आवन की
नन्हीं-नन्हीं बूँदन मेहा बरसे, शीतल पवन सुहावन की
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, आनँद मंगल गावन की

Main Giridhar Ke Ghar Jau

प्रगाढ़ प्रीति
मैं गिरिधर के घर जाऊँ
गिरिधर म्हाँरो साँचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊँ
रैन पड़ै तब ही उठ जाऊँ, भोर भये उठि आऊँ
रैन दिना वाके सँग खेलूँ, ज्यूँ त्यूँ ताहि रिझाऊँ
जो पहिरावै सोई पहिरूँ, जो दे सोई खाऊँ
मेरी उनकी प्रीति पुरानी, उन बिन पल न रहाऊँ
जहाँ बैठावे तितही बैठूँ, बेचे तो बिक जाऊँ
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, बार बार बलि जाऊँ

Vinati Suno Shyam Meri

विरह व्यथा
विनती सुनो श्याम मेरी, मैं तो हो गई थारी चेरी
दरसन कारण भई बावरी, विरह व्यथा तन घेरी
तेरे कारण जोगण हूँगी, करूँ नगर बिच फेरी
अंग गले मृगछाला ओढूँ, यो तन भसम करूँगी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, वन-वन बीच फिरूँगी

Ab Tum Kab Simaroge Ram

हरिनाम स्मरण
अब तुम कब सुमरो गे राम, जिवड़ा दो दिन का मेहमान
गरभापन में हाथ जुड़ाया, निकल हुआ बेइमान
बालापन तो खेल गुमाया, तरूनापन में काम
बूढ़ेपन में काँपन लागा, निकल गया अरमान
झूठी काया झूठी माया, आखिर मौत निदान
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, क्यों करता अभिमान

Bhajo Re Bhaiya Ram Govind Hari

हरि कीर्तन
भजो रे भैया राम गोविन्द हरी
जप तप साधन कछु नहिं लागत, खरचत नहिं गठरी
संतति संपति सुख के कारण, जासे भूल परी
कहत ‘कबीर’ राम नहिं जा मुख, ता मुख धुल भरी

Aur Ansha Avtar Krishna Bhagwan Swayam Hai

परब्रह्म श्री कृष्ण
और अंश अवतार कृष्ण भगवान स्वयम् हैं
वे मानुस बनि गये, यशोदा नन्द-नँदन हैं
सकल भुवन के ईश एक, आश्रय वनवारी
मोर मुकुट सिर धारि अधर, मुरली अति प्यारी
रस सरबस श्रृंगार के, साक्षात् श्रृंगार हैं
जो विभु हैं, आनन्दघन, उन प्रभु की हम शरन हैं