Charan Kamal Bando Hari Rai

वंदना
चरन-कमल बंदौं हरि राइ
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे कौ सब कछु दरसाइ
बहिरो सुनै मूक पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराइ
‘सूरदास’ स्वामी करुनामय, बार-बार बन्दौ तेहि पाइ

He Hari Nam Ko Aadhar

नाम स्मरण
है हरि नाम को आधार
और या कलिकाल नाहिन, रह्यो विधि ब्यौहार
नारदादि, सुकादि संकर, कियो यहै विचार
सकल श्रुति दधि मथत काढ्यो, इतो ही घृतसार
दसहुँ दिसि गुन करम रोक्यो, मीन को ज्यों जार
‘सूर’ हरि को सुजस गावत, जेहि मिटे भवभार

Baithe Hari Radha Sang

मुरली मोहिनी
बैठे हरि राधासंग, कुंजभवन अपने रंग
मुरली ले अधर धरी, सारंग मुख गाई
मनमोहन अति सुजान, परम चतुर गुन-निधान
जान बूझ एक तान, चूक के बजाई
प्यारी जब गह्यो बीन, सकल कला गुन प्रवीन
अति नवीन रूप सहित, तान वही सुनाई
‘वल्लभ’ गिरिधरनलाल, रीझ कियो अंकमाल
कहन लगे नन्दलाल, सुन्दर सुखदाई 

Chadi Man Hari Vimukhan Ko Sang

प्रबोधन
छाड़ि मन, हरि-विमुखन को संग
जिनके संग कुमति उपजत है, परत भजन में भंग
कहा होत पय-पान कराए, विष नहिं तजत भुजंग
कागहिं कहा कपूर चुगाए, स्वान न्हवाए गंग
खर कौं कहा अरगजा-लेपन मरकट भूषन अंग
गज कौं कहा सरित अन्हवाए, बधुरि धरै वह ढंग
पाहन पतित बान नहिं बेधत, रीतो करत निषंग
‘सूरदास’ कारी कामरि पै, चढ़त न दूजौ रंग

Ab To Hari Nam Lo Lagi

चैतन्य महाप्रभु
अब तो हरी नाम लौ लागी
सब जग को यह माखन चोरा, नाम धर्यो बैरागी
कित छोड़ी वह मोहक मुरली, कित छोड़ी सब गोपी
मूँड मुँडाई डोरी कटि बाँधी, माथे मोहन टोपी
मात जसोमति माखन कारन, बाँधे जाके पाँव
श्याम किसोर भयो नव गौरा, चैतन्य जाको नाँव
पीताम्बर को भाव दिखावे, कटि कोपीन कसै
गौर कृष्ण की दासी ‘मीराँ’ रसना कृष्ण बसै

Bhaj Le Pyare Hari Ka Nam

नाम स्मरण
भजले प्यारे हरि का नाम, इसमें लगे न कुछ भी दाम
कर न बुराई कभी किसी की, जप ले मन से हरि का नाम
नयनों से दर्शन हो हरि का, सुनों कान से प्रभु का गान
करो तीर्थ सेवन पैरों से, करो हाथ से समुचित दान
मन बुद्धि श्रद्धा से प्यारे, होय नित्य ही हरि का ध्यान
एकमात्र साधन यह कलि में, शास्त्र संत का यही विधान 

Jasoda Hari Palne Jhulawe

पालना
जसोदा हरि पालना झुलावै
मेरे लाल की आउ निंदरिया, काहे न आन सुवावै
तूँ काहैं नहि बेगिहि आवै, तोको कान्ह बुलावै
कबहुँ पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै
सौवत जानि मौन ह्वैके रहि, करि करि सैन बतावै
जो सुख ‘सूर’ देव मुनि दुरलभ, सो नँद भामिनि पावें

Jaao Hari Nirmohiya Re

स्वार्थ की प्रीति
जाओ हरि निरमोहिया रे, जाणी थाँरी प्रीत
लगन लगी जब और प्रीत थी, अब कुछ उलटी रीत
अमृत पाय जहर क्यूँ दीजे, कौण गाँव की रीत
‘मीराँ’ कहे प्रभु गिरधर नागर, आप गरज के मीत

Main Apno Man Hari So Joryo

मोहन से प्रीति
मैं अपनो मन हरि सों जोर्यो, हरि सों जोरि सबनसो तोर्यो
नाच नच्यों तब घूँघट कैसो, लोक-लाज डर पटक पिछोर्यो
आगे पाछे सोच मिट गयो, मन-विकार मटुका को फोर्यो
कहनो थो सो कह्यो सखी री, काह भयो कोऊ मुख मोर्यो
नवल लाल गिरिधरन पिया संग, प्रेम रंग में यह तन बोर्यो
‘परमानंद’ प्रभु लोग हँसन दे, लोक वेद तिनका ज्यों तोर्यो

Tum Meri Rakho Laj Hari

शरणागति
तुम मेरी राखौ लाज हरी
तुम जानत सब अंतरजामी, करनी कछु न करी
औगुन मोसे बिसरत नाहीं, पल-छिन घरी-घरी
सब प्रपंच की पोट बाँधिकैं, अपने सीस धरी
दारा-सुत-धन मोह लियो है, सुधि-बुधि सब बिसरी
‘सूर’ पतित को बेग उधारो, अब मेरी नाव भरी