Mat Kar Itana Pyar Tu Tan Se

देह से प्रेम
मत कर इतना प्यार तू तन से, नहीं रहेगा तेरा
बहुत सँवारा इत्र लगाया, और कहे यह मेरा
बढ़िया भोजन नित्य कराया, वस्त्रों का अंबार
बचपन, यौवन बीत गया तब, उतरा मद का भार
पति, पत्नी-बच्चों तक सीमित था तेरा संसार
स्वारथ के साथी जिन पर ही, लूटा रहा सब प्यार
सब कुछ तो नश्वर इस जग में, कहता काल पुकार
तन, धन छोड़ा सभी यहाँ पर, पहुँचा यम के द्वार

Re Man Ram So Kar Preet

श्री राम भजो
रे मन राम सों कर प्रीत
श्रवण गोविंद गुण सुनो, अरु गा तू रसना गीत
साधु-संगत, हरि स्मरण से होय पतित पुनीत
काल-सर्प सिर पे मँडराये, मुख पसारे भीत
आजकल में तोहि ग्रसिहै, समझ राखौ चीत
कहे ‘नानक’ राम भजले, जात अवसर बीत 

Gwalin Kar Te Kor Chudawat

बालकृष्ण लीला
ग्वालिन कर ते कौर छुड़ावत
झूठो लेत सबनि के मुख कौ, अपने मुख लै नावत
षट-रस के पकवान धरे बहु, तामें रूचि नहिं पावत
हा हा करि करि माँग लेत हैं, कहत मोहि अति भावत
यह महिमा वे ही जन जानैं, जाते आप बँधावत
‘सूर’ श्याम सपने नहिं दरसत, मुनिजन ध्यान लगावत

Sandesha Shyam Ka Le Kar

गोपियों का वियोग
संदेशा, श्याम का लेकर, उधोजी ब्रज में आये हैं
कहा है श्यामसुन्दर ने गोपियों दूर मैं नहीं हूँ
सभी में आत्मवत् हूँ मैं, चेतना मैं ही सबकी हूँ
निरन्तर ध्यान हो मेरा, रखो मन पास में मेरे
वृत्तियों से रहित होकर, रहोगी तुम निकट मेरे
गोपियों ने कहा ऊधो, सिखाते योग विद्या अब
मिलें निर्गुण से कैसे हम, ज्ञान की व्यर्थ बातें सब
उधोजी! सुधा अधरों की पिलाई, हम को प्यारे ने
संग में रासलीला की, लगीं फिर बिलख कर रोने
कहा फिर श्याम की चितवन, सभी को वश में करतीं है
चुराया चित्त हम सबका, नहीं हम भूल सकतीं है
चढ़ाई सिर पे उद्धव ने, चरण-रज गोपियों की है
सुनाई श्याम को जाके, दशा जो गोपियों की है  

Sobhit Kar Navneet Liye

बाल कृष्ण माधुर्य
सोभित कर नवनीत लिये
घुटुरुन चलत रेनु तन मंडित, मुख दधि लेप किये
चारू कपोल, लोल लोचन, गोरोचन तिलक दिये
लत लटकनि मनौ मत्त मधुप गन, माधुरि मधुहि पिये
कठुला कंठ वज्र के हरि नख, राजत रुचिर हिये
धन्य ‘सूर’ एकेउ पल यहि सुख, का सत् कल्प जियें

Mhari Sudh Kripa Kar Lijo

शरणागति
म्हारी सुध किरपा कर लीजो
पल पल ऊभी पंथ निहारूँ, दरसण म्हाने दीजो
मैं तो हूँ बहु ओगुणवाली, औगुण सब हर लीजो
मैं दासी थारे चरण-कँवल की, मिल बिछड़न मत कीजो
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणाँ में लीजो

Din Yu Hi Bite Jate Hain Sumiran Kar Le Tu Ram Nam

नाम स्मरण
दिन यूँ ही बीते जाते हैं, सुमिरन करले तूँ राम नाम
लख चौरासी योनी भटका, तब मानुष के तन को पाया
जिन स्वारथ में जीवन खोया, वे अंत समय पछताते हैं
अपना जिसको तूँने समझा, वह झूठे जग की है माया
क्यों हरि का नाम बीसार दिया, सब जीते जी के नाते हैं
विषयों की इच्छा मिटी नहीं, ये नाशवान सुन्दर काया
गिनती के साँस मिले तुझको, जाने पे फिर नहीं आते हैं
सच्चे मन से सुमिरन कर ले, अब तक मूरख मन भरमाया
साधु-संगत करले ‘कबीर’, तो निश्चित ही तर जाते हैं

Mat Kar Moh Tu Hari Bhajan Ko Man Re

भजन महिमा
मत कर मोह तू, हरि-भजन को मान रे
नयन दिये दरसन करने को, श्रवण दिये सुन ज्ञान रे
वदन दिया हरि गुण गाने को, हाथ दिये कर दान रे
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, कंचन निपजत खान रे

Ham To Ek Hi Kar Ke Mana

आत्म ज्ञान
हम तो एक ही कर के माना
दोऊ कहै ताके दुविधा है, जिन हरि नाम न जाना
एक ही पवन एक ही पानी, आतम सब में समाना
एक माटी के लाख घड़े है, एक ही तत्व बखाना
माया देख के व्यर्थ भुलाना, काहे करे अभिमाना
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, हम हरि हाथ बिकाना

Are Man Kar Prabhu Par Vishvas

प्रभु का भरोसा
अरे मन कर प्रभु पर विश्वास
भटक रहा क्यों इधर-उधर तूँ, झूठे सुख की आस
सुन्दर देह सुहावनि नारी, सब विधि भोग-विलास
क्या पाया घरबार पुत्र से, मिटी न यम की त्रास
क्षण-भङ्गुर सब भोग निरंतर, बने काल के ग्रास
मिले परम सुख, घटे कभी नहिं, जिनके मन विश्वास