Ram Nam Ras Pije Manua

श्याम का रंग
राम-नाम रस पीजै, मनुआ! राम-नाम रस पीजै
ताज कुसंग, सत्संग बैठ नित, हरि-चर्चा सुन लीजै
काम, क्रोध, मद लोभ, मोह कूँ बहा चित्त से दीजै
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, ताहि के रंग में भीजै

Re Man Ram So Kar Preet

श्री राम भजो
रे मन राम सों कर प्रीत
श्रवण गोविंद गुण सुनो, अरु गा तू रसना गीत
साधु-संगत, हरि स्मरण से होय पतित पुनीत
काल-सर्प सिर पे मँडराये, मुख पसारे भीत
आजकल में तोहि ग्रसिहै, समझ राखौ चीत
कहे ‘नानक’ राम भजले, जात अवसर बीत 

Janani Main Na Jiu Bin Ram

भरत की व्यथा
जननी मैं न जीऊँ बिन राम
राम लखन सिया वन को सिधाये, राउ गये सुर धाम
कुटिल कुबुद्धि कैकेय नंदिनि, बसिये न वाके ग्राम
प्रात भये हम ही वन जैहैं, अवध नहीं कछु काम
‘तुलसी’ भरत प्रेम की महिमा, रटत निरंतर नाम

Ab Tum Kab Simaroge Ram

हरिनाम स्मरण
अब तुम कब सुमरो गे राम, जिवड़ा दो दिन का मेहमान
गरभापन में हाथ जुड़ाया, निकल हुआ बेइमान
बालापन तो खेल गुमाया, तरूनापन में काम
बूढ़ेपन में काँपन लागा, निकल गया अरमान
झूठी काया झूठी माया, आखिर मौत निदान
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, क्यों करता अभिमान

Shri Ram Ko Maa Kaikai Ne

राम वनगमन
श्रीराम को माँ कैकयी ने दिया जभी वनवास
उनके मुख पर कहीं निराशा का, न तभी आभास
मात कौसल्या और सुमित्रा विलपे, पिता अचेत
उर्मिला की भी विषम दशा थी, त्यागे लखन निकेत
जटा बनाई वल्कल पहने, निकल पड़े रघुनाथ
जनक-नन्दिनी, लक्ष्मण भाई, गये उन्हीं के साथ
आज अयोध्या के नर नारी, विह्वल और उदास
विदा कर रहे अश्रु नयन में, राम गये वनवास

Jay Ram Rama Ramnam Samanam

श्री राम वन्दना
जय राम रमा- रमनं समनं , भव-ताप भयाकुल पाहिजनं
अवधेस, सुरेस, रमेस विभो, सरनागत माँगत पाहि प्रभो
दस-सीस-बिनासन बीस भुजा, कृत दूरि महा-महि भूरि-रुजा
रजनी-चर-वृन्द-पतंग रहे, सर-पावक-तेज प्रचंड दहे
महि-मंडल-मंडन चारुतरं, धृत-सायक-चाप-निषंग-बरं
मद-मोह-महा ममता-रजनी, तमपुंज दिवाकर-तेज-अनी
मनजात किरात निपात किए, मृग, लोभ कुभोग सरेनहिए
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे, विषया वन पाँवर भूलि परे
बहु रोग वियोगन्हि लोग हए, भव दंघ्रि निरादर के फल ए
भव-सिन्धु अगाध परे नर ते, पद-पंकज-प्रेम न जे करते
अतिदिन मलीन दुखी नितहीं, जिनके पद पंकज प्रति नहीं
अवलंब भवन्त कथा जिन्हकें, प्रिय सन्त अनन्त सदा तिन्हकें
नहि राग न लोभ न मान मदा, तिन्हके सम वैभव वा विपदा
एहि ते तव सेवक होत मुदा, मुनि त्यागत जोग भरोस सदा
करि प्रेम निरन्तर नेम लिए, पद पंकज सेवत शुद्ध हिए
सम मानि निरादर आदर ही, सब सन्त सुखी विचरन्त मही
मुनि मानस पंकज भृंग भजे, रघुवीर महा रनधीर अजे
तब नाम जपामि ननामि हरी, भव रोग महागद मान अरी
गुनसील कृपा परमायतनं, प्रनमामि निरंतर श्री रमनं
रघुनन्द निकन्दय द्वन्द्वघनं, महिपाल विलोकय दीन जनं

Jiv Bas Ram Nam Japna

हरिनाम स्मरण
जीव बस राम नाम जपना, जरा भी मत करना फिकरी
भाग लिखी सो हुई रहेगी, भली बुरी सगरी
ताप करके हिरणाकुश राजा, वर पायो जबरी
लौह लकड़ से मार्यो नाहीं, मर्यौ मौत नख री
तीन लोक ककी माता सीता, रावण जाय हरी
जब लक्षमण ने करी चढ़ाई, लंका गई बिखरी
आठों पहर राम को रटना, ना करना जिकरी
कहत ‘ कबीर’ सुनो भाई साधो, रहना बिन फिकरी

Shri Ram Jape Ham Kaise Hi

राम नाम महिमा
श्री राम जपें हम कैसे ही
उलटा नाम जपा वाल्मीकि ने, ब्रह्मर्षि हो गये वही
लिया अजामिल ने धोखे से नाम तर गया भवसागर
द्रुपद-सुता जब घिरी विपद् से, लाज बचाई नटनागर
गज, गणिका का काम बन गया, प्रभु-कृपा से ही तो
प्रतीति प्रीति हो दो अक्षर में, श्रीराम मिले उसको तो
रामनाम के पत्थर तर गये, सेतु बँधा सागर में
सेना पहुँच गई लंका में, निशिचर मरे समर में

Jake Priy Na Ram Vedehi

राम-पद-प्रीति
जाके प्रिय न राम वैदेही
तजिये ताहि कोटि बैरीसम, जद्यपि परम सनेही
तज्यो पिता प्रह्लाद, विभीषन बंधु, भरत महतारी
बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज – बनितनि, भये मुद – मंगलकारी
नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं
अंजन कहाँ आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं
‘तुलसी’ सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रान ते प्यारो
जासों होइ सनेह राम – पद, एतो मतो हमारो

Din Yu Hi Bite Jate Hain Sumiran Kar Le Tu Ram Nam

नाम स्मरण
दिन यूँ ही बीते जाते हैं, सुमिरन करले तूँ राम नाम
लख चौरासी योनी भटका, तब मानुष के तन को पाया
जिन स्वारथ में जीवन खोया, वे अंत समय पछताते हैं
अपना जिसको तूँने समझा, वह झूठे जग की है माया
क्यों हरि का नाम बीसार दिया, सब जीते जी के नाते हैं
विषयों की इच्छा मिटी नहीं, ये नाशवान सुन्दर काया
गिनती के साँस मिले तुझको, जाने पे फिर नहीं आते हैं
सच्चे मन से सुमिरन कर ले, अब तक मूरख मन भरमाया
साधु-संगत करले ‘कबीर’, तो निश्चित ही तर जाते हैं