Govind Karat Murali Gan

मुरली माधुर्य
गोविन्द करत मुरली गान
अधर पर धर श्याम सुन्दर, सप्त स्वर संधान
विमोहे ब्रज-नारि, खग पशु, सुनत धरि रहे ध्यान
चल अचल सबकी भई यह, गति अनुपम आन
ध्यान छूटे मुनिजनों के, थके व्योम विमान
‘कुंभनदास’ सुजान गिरिधर, रची अद्भुत तान

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