Udho Mohi Braj Bisarat Nahi

ब्रज की याद
ऊधौ, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं
वृंदावन गोकुल की स्मृति, सघन तृनन की छाहीं
प्रात समय माता जसुमति अरु नंद देखि सुख पावत
मीठो दधि अरु माखन रोटी, अति हित साथ खवावत
गोपी ग्वाल-बाल संग खेलत, सब दिन हँसत सिरात
‘सूरदास’ धनि धनि ब्रजबासी जिनसों हँसत ब्रजनाथ

Braj Ko Bacha Lo Mohan

गोवर्धन लीला
ब्रज को बचा लो मोहन, रक्षा करो हमारी
हो कु्रद्ध शची के पति ने, वर्षा करी है भारी
आँधी भी चल रही है, ओले बरस रहे हैं
पानी से भर गया ब्रज, सब कष्ट से घिरे हैं
गिरिराज को उखाड़ा, ले हाथ पर हरि ने
उसको उठाये रक्खा, दिन सात तक उन्होंने
ब्रज हो गया सुरक्षित, पानी उतर गया था
तब पूर्ववत प्रभु ने, गिरिराज को रखा था
श्रीकृष्ण को लगाया, हृदय से था सभी ने
और देवता लगे सब, पुष्पों की वर्षा करने

Kaha Sukh Braj Ko So Sansar

ब्रज-महिमा
कहाँ सुख ब्रज कौ सौ संसार
कहाँ सुखद बंसी-वट जमुना, यह मन सदा विचार
कहाँ बन धाम कहाँ राधा सँग, कहाँ संग ब्रज वाम
कहाँ विरह सुख बिन गोपिन सँग, ‘सूर’ स्याम मन साम

Braj Main Ghar Ghar Bajat Badhai

श्री राधा प्राकट्य
ब्रिज में घर घर बजत बधाई
अतिशय रूप निरख कन्या का माँ कीरति है हर्षाई
सकल लोक की सुंदरता, वृषभानु गोप के आई
जाको जस सुर मुनी सब कोई, भुवन चतुर्दश गाई
नवल-किशोरी गुन निधि श्यामा, कमला भी ललचाई
प्रगटे पुरुषोत्तम श्री राधा द्वै विधि रूप बनाई 

Khelat Hari Nikase Braj Khori

राधा कृष्ण भेंट
खेलत हरि निकसे ब्रज खोरी
गए स्याम रवि – तनया के तट, अंग लसति चंदन की खोरी
औचक ही देखि तहँ राधा, नैन बिसाल , भाल दिए रोरी
‘सूर’ स्याम देखत ही रीझे, नैन नैन मिलि परी ठगोरी

Braj Main Kaisi Hori Machai

होली
ब्रज में कैसी होरी मचाई, करत परस्पर रोरी
नंदकुँवर बरसाने आये, खेलन के मिस होरी
बाँह पकड़ एक ग्वालिन की वे, बहुत ही करै चिरौरी
अब तो बहियाँ छोड़ो प्यारे, देखत हमें किसोरी
अधिक अधीर राधिका आई, जानत श्याम ठगोरी
होली खेलत राधा मोहन, गलियन रंग बह्योरी
लाल भयो कटिपट मोहन को, लाल राधिका गोरी

Jo Sukh Braj Me Ek Ghari

ब्रज का सुख
जो सुख ब्रज में एक घरी
सो सुख तीनि लोक में नाहीं, धनि यह घोष पुरी
अष्ट सिद्धि नव निधि कर जोरे, द्वारैं रहति खरी
सिव-सनकादि-सुकादि-अगोचर, ते अवतरे हरी
धन्य धन्य बड़ भागिनि जसुमति, निगमनि सही परी
ऐसे ‘सूरदास’ के प्रभु को, लीन्हौ अंक भरी

Ter Suno Braj Raj Dulare

विनय
टेर सुनो ब्रज राज दुलारे
दीन-मलीन हीन सुभ गुण सों, आन पर्यो हूँ द्वार तिहारे
काम, क्रोध अरु कपट, लोभ, मद, छूटत नहिं प्राण ते पियारे
भ्रमत रह्यो इन संग विषय में, ‘सूरदास’ तव चरण बिसारे

Dadhi Bechati Braj Galini Fire

प्रेमानुभूति
दधि बेचति ब्रज-गलिनि फिरै
गोरस लैन बुलावत कोऊ, ताकी सुधि नैकौ न करै
उनकी बात सुनति नहिं स्रवनन, कहति कहा ए घरनि जरै
दूध, दही ह्याँ लेत न कोऊ, प्रातहि तैं सिर लिऐं ररै
बोलि उठति पुनि लेहु गुपालै, घर-घर लोक-लाज निदरै
‘सूर’ स्याम कौ रूप महारस, जाकें बल काहू न डरै

Braj Ke Birahi Log Dukhare

वियोग
ब्रज के बिरही लोग दुखारे
बिन गोपाल ठगे से ठाढ़े, अति दुरबल तनु कारे
नन्द जसोदा मारग जोवत, नित उठि साँझ सकारे
चहुँ दिसि ‘कान्ह कान्ह’ करि टेरत, अँसुवन बहत पनारे
गोपी गाय ग्वाल गोसुत सब, अति ही दीन बिचारे
‘सूरदास’ प्रभु बिन यों सोभित, चन्द्र बिना ज्यों तारे