Are Ham Naam Jape Shiv Ka

शिव महिमा
अरे! हम नाम जपें शिव का, नित्य श्रद्धा से बारम्बार
महादेव की महिमा भारी, कोई न पाये पार
आशुतोष को भोले शंकर, कहता सब संसार
आप हिमालय पे गौरी संग, करे दिव्य अभिसार
रौद्र रूप में करते हैं शिव, दुष्टों का संहार
गंग विराजे जटा बीच, शशि मस्तक का श्रृंगार
बम बम भोले ओढरदानी, कर दो भवनिधि पार

Jiwan Ko Yagya Banaye Ham

यज्ञ
जीवन को यज्ञ बनायें हम
निष्काम भाव से ईश्वर को, जब कर्म समर्पित हो जाते
तो अहं वासना जल जाते, मुक्ति का दान वही देते
हम हवन कुण्ड में समिधा से अग्नि को प्रज्वलित करते
आहुति दे घृत वस्तु की, वेदों में यज्ञ इसे कहते
जब प्राण बचाने परेवा का, राजा शिवि जो अपने तन का
सब मांस भेंट ही कर देते, यह भूत यज्ञ अद्भुत उनका
कई दिन से भूखे रंतिदेव, परिवार सहित जब अतिथि को
सारा भोजन अर्पित करते, भूखा रखकर वे अपने को
दधीचि महर्षि ने निज तन की, दे दी थी अस्थियाँ देवों को
सेवा पथ का यह श्रेष्ठ रूप, गीता में यज्ञ कहे इसको
परहित में जो शुभ कर्म करे अकर्म वही कहलाते हैं
परमार्थ का जो भी कर्म करें, यज्ञ स्वरूप हो जाते हैं

Nirvishayi Banayen Man Ko Ham

प्रबोधन
निर्विषयी बनायें मन को हम
चिन्तन हो बस परमात्मा का, हो सुलभ तभी जीवन में राम
मन और इन्द्रियाँ हो वश में, संयम सेवा का संग्रह हो
अनुकूल परिस्थिति आयेगी, सब कार्य स्वतः मंगलमय हो
उत्पन्न कामना से होते, सारे ही पाप और विपदा
जब अचल शांति हो प्राप्त तभी, मानव को रहे न क्षोभ कदा
जब आकर्षण हो भोगों में, मन भटक रहा हो कहीं तभी
यदि पूर्ण समर्पण हो प्रभु में, तो छूट जाये आसक्ति सभी

Prabhu Ko Prasanna Ham Kar Paye

श्रीमद्भागवत
प्रभु को प्रसन्न हम कर पाये
चैतन्य महाप्रभु की वाणी, श्री कृष्ण भक्ति मिल जाये
कोई प्रेम भक्ति के बिना उन्हें, जो अन्य मार्ग को अपनाये
सखि या गोपी भाव रहे, संभव है दर्शन मिल जाये
हम दीन निराश्रय बन करके, प्रभु प्रेमी-जन का संग करें
भगवद्भक्तों की पद-रज को, अपने माथे पर स्वतः धरें
यशुमति-नंदन श्री कृष्णचन्द्र, आराध्य परम एक मात्र यही
दुनिया के बंधन तोड़ सभी, हम वरण करें बस उनको ही
उत्कृष्ट ग्रन्थ श्रीमद्भागवत, सब शास्त्रों का है यही सार
हम पढ़ें, नित्य संकीर्तन हो, प्रभु भक्ति का उत्तम प्रकार

Prabhu Ji Tum Chandan Ham Paani

दास्य भक्ति
प्रभुजी! तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी
प्रभुजी! तुम घन वन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा
प्रभुजी! तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरे दिन राती
प्रभुजी! तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहि मिलत सुहागा
प्रभुजी! तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करे ‘रैदासा’

Vipatti Ko Samjhen Ham Vardaan

विपदा का लाभ
विपत्ति को समझें हम वरदान
सुख में याद न आये प्रभु की, करें नहीं हम गान
कुन्ती ने माँगा था प्रभु से, विपदायें ही आयें
कष्ट दूर करने प्रभु आये, दर्शन तब हो जायें
हुआ वियोग श्याम से जिनका, गोपियन अश्रु बहाये
स्मरण करे प्रतिपल वे उनको, दिवस रात कट जाये
अनुकुल प्रतिकूल परिस्थिति, जीवन में जो आये
विधि का यही विधान समझलें, वो ही मनशांति को पाये

Shri Ram Jape Ham Kaise Hi

राम नाम महिमा
श्री राम जपें हम कैसे ही
उलटा नाम जपा वाल्मीकि ने, ब्रह्मर्षि हो गये वही
लिया अजामिल ने धोखे से नाम तर गया भवसागर
द्रुपद-सुता जब घिरी विपद् से, लाज बचाई नटनागर
गज, गणिका का काम बन गया, प्रभु-कृपा से ही तो
प्रतीति प्रीति हो दो अक्षर में, श्रीराम मिले उसको तो
रामनाम के पत्थर तर गये, सेतु बँधा सागर में
सेना पहुँच गई लंका में, निशिचर मरे समर में

Bharat Bhai Kapi Se Urin Ham Nahi

कृतज्ञता
भरत भाई कपि से उऋण हम नाहीं
सौ योजन मर्याद सिन्धु की, लाँघि गयो क्षण माँही
लंका-जारि सिया सुधि लायो, गर्व नहीं मन माँही
शक्तिबाण लग्यो लछमन के, शोर भयो दल माँही
द्रोणगिरि पर्वत ले आयो, भोर होन नहीं पाई
अहिरावण की भुजा उखारी, पैठि गयो मठ माँही
जो भैया, हनुमत नहीं होते, को लावत जग माँही
आज्ञा भंग कबहुँ नहीं कीन्हीं, जहँ पठयऊँ तहँ जाई
‘तुलसिदास’, मारुतसुत महिमा, निज मुख करत बड़ाई

Jo Ham Bhale Bure To Tere

शरणागति
जो हम भले-बुरे तो तेरे
तुमहिं हमारी लाज बड़ाई, विनती सुनु प्रभु मेरे
सब तजि तव सरनागत आयो, निज कर चरन गहे रे
तव प्रताप बल बदत न काहू, निडर भये घर चेरे
और देव सब रंक भिखारी, त्यागे बहुत अनेरे
‘सूरदास’ प्रभु तुम्हरि कृपा ते, पाये सुख जु घनेरे

Dekhe Ham Hari Nangam Nanga

श्याम स्वरुप
देखे हम हरि नंगम्नंगा
आभूषण नहिं अंग बिराजत, बसन नहीं, छबि उठत तरंगा
अंग अंग प्रति रूप माधुरी, निरखत लज्जित कोटि अनंगा
किलकत दसन दधि मुख लेपन, ‘सूर’ हँसत ब्रज जुवतिन संगा