Swami Sab Sansar Ka Ji Sancha Shri Bhagwan

संसार के स्वामी
स्वामी सब संसार का जी, साँचा श्री भगवान
दान में महिमा थाँरी देखी, हुई हरि मैं हैरान
दो मुठ्ठी चावल की फाँकी, दे दिया विभव महान
भारत में अर्जुन के आगे, आप हुया रथवान
ना कोई मारे, ना कोई मरतो, यो कोरो अज्ञान
चेतन जीव तो अजर अमर है, गीताजी को ज्ञान
म्हारा पे प्रभु किरपा करजो, दासी अपणी जान
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कमल में ध्यान

Kya Yagya Ka Uddeshya Ho

यज्ञ
क्या यज्ञ का उद्देश्य हो
दम्भ अथवा अहं हो नहीं, शुद्ध सेवा भाव हो
हो समर्पण भावना, अरु विश्व का कल्याण हो
इन्द्रिय-संयम भी रहे, अवशिष्ट भोगे यज्ञ में
शाकल्य का मंत्रों सहित, हो हवन वैदिक यज्ञ में
संयम रूपी अग्नि में, इन्द्रिय-सुखों का हवन हो
अध्यात्म की दृष्टि से केवल, शास्त्र का स्वाध्याय हो
इस भाँति ज्ञानाग्नि में साधक, अज्ञान की आहूति दे
आहार संयम भी रहे, तो यज्ञ-साधन मुक्ति दे
द्रव्यों से होता यज्ञ उससे, ज्ञान-यज्ञ ही श्रेष्ठ है
अज्ञान एवं अहं को, ज्ञानाग्नि करती नष्ट है

Prathvi Par Atyacharon Ka

प्रभु प्राकट्य
पृथ्वी पर अत्याचारों का, है लग जाता अम्बार जभी
मंगलमय जो है परब्रह्म, विष्णु लेते अवतार तभी
पुरुषोत्तम श्रीमन् नारायण, हैं परमानन्द स्वरूप आप
स्थापित करते पुनः धर्म, साधु सन्तों का हरें ताप
कछुवा, वराह, हयग्रीव, मत्स्य का रूप धरे वे ही आते
संहार करें वे असुरों का, पृथ्वी का भार वही हरते
श्री राम, कृष्ण, वामन, नरसिंह, जिनका करते हैं भक्त गान
लीलाएँ उनकी पढ़ें सुनें, हिरदै में उनका धरे ध्यान

Gunghat Ka Pat Khol Re Toko Peev Milenge

अज्ञान निवृत्ति
घूँघट का पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे
घट घट में वह साईं रमता, कटुक वचन मत बोल रे
धन जोबन को गरब न कीजे, झूठा पचरंग चोल रे
सुन्न महल में दीप जलाले, आसन सों मत डोल रे
जाग जुगुत सो रंग-महल में, पिय पायो अनमोल रे
कहे ‘कबीर’ अनन्द भयो है, बाजत अणहद ढोल रे

Gayon Ke Hit Ka Rahe Dhyan

गो माता
गायों के हित का रहे ध्यान
गो-मांस करे जो भी सेवन, निर्लज्ज व्यक्ति पापों की खान
गौ माँ की सेवा पुण्य बड़ा, भवनिधि से करदे हमें पार
वेदों ने जिनका किया गान, शास्त्र पुराण कहे बार-बार
गौ-माता माँ के ही सदृश, वे दु:खी पर हम चुप रहते
माँ की सेवा हो तन मन से, भगवान कृष्ण को वह पाते

Bhagwan Krishna Lilamrut Ka

ब्रह्माजी का भ्रम
भगवान् कृष्णलीलामृत का, हम तन्मय होकर पान करें
ब्रह्मा तक समझ नहीं पाये, उन सर्वात्मा का ध्यान धरें
यमुनाजी का रमणीय-पुलीन, जहाँ ग्वाल बाल भी सँग में हैं
मंडलाकार आसीन हुए, भगवान् बीच में शोभित हैं
बछड़े चरते थे हरी घास, मंडली मग्न थी भोजन में
भगवान कृष्ण की लीला से, ब्रह्मा भी पड़े अचम्भे में
मौका पाकर के ब्रह्मा ने, अन्यत्र छिपाया बछड़ों को
दधि-भात-कौर को हाथ लिये, श्रीकृष्ण ढूँढते तब उनको
अवसर का लाभ उठा ब्रह्मा ने, ग्वाल बाल भी छिपा दिये
खिलवाड़ चला यह एक वर्ष, कोई न समझ इसको पाये
ब्रह्माजी को जब ज्ञान हुआ, गिर पड़े प्रभु के चरणों में
तन मन उनका रोमांचित था, अरु अश्रु भरे थे नैनों में

Ka Mere Man Mah Base Vrindawan Var Dham

अभिलाषा
कब मेरे मन महँ बसै, वृन्दावन वर धाम
कब रसना निशि दिन रटै, सुखते श्यामा श्याम
कब इन नयननिते लखूँ, वृन्दावन की धूरि
जो रसिकनि की परम प्रिय, पावन जीवन मूरि
कब लोटूँ अति विकल ह्वै, ब्रजरज महँ हरषाय
करूँ कीच कब धूरि की, नयननि नीर बहाय
कब रसिकनि के पैर परि, रोऊँ ह्वैके दीन
कब प्रिय दर्शन बिनु बनूँ, विकल नीर बिनु मीन
कब अति कोमल चित रसिक, मोकूँ हिये लगाय
गहकि मिलैं सिर कर धरैं, मगन होहिं अपनाय
वृन्दावन महँ सखिनि संग, कब निरखूँ नँद नन्द
मोर मुकुट सिर बेनु कर, कारी कमरी कन्ध
कब मोकूँ यशुमति तनय, सखा समुझि लै संग
खेलैं वृन्दा-विपिन महँ, परसे मेरो अंग
कदँब तले ठाड़े उभय, दीये युगल गल बाँह
मोर मुकुट में चन्द्रिका, सटी कपोल उछाँह
राधा बाधा हरन द्वै, अच्छर हिय में धारी
भवसागर तरि जाइगो, सबही सोच बिसारि

Chod Jhamela Jhuthe Jag Ka Kah Gaye Das Kabir

मिथ्या संसार
छोड़ झमेला झूठे जग का, कह गये दास कबीर
उड़ जायेगा साँस का पंछी, शाश्वत नहीं शरीर
तुलसीदास के सीता राघव उनसे मन कर प्रीति
रामचरित से सीख रे मनवा, मर्यादा की रीति
बालकृष्ण की लीलाओं का धरो हृदय में ध्यान
सूरदास से भक्ति उमड़े करो उन्हीं का गान
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर करो उन्हीं से छोह
कृष्ण मिलन का भाव रहे मन छोड़ जगत का मोह

Bhaj Le Pyare Hari Ka Nam

नाम स्मरण
भजले प्यारे हरि का नाम, इसमें लगे न कुछ भी दाम
कर न बुराई कभी किसी की, जप ले मन से हरि का नाम
नयनों से दर्शन हो हरि का, सुनों कान से प्रभु का गान
करो तीर्थ सेवन पैरों से, करो हाथ से समुचित दान
मन बुद्धि श्रद्धा से प्यारे, होय नित्य ही हरि का ध्यान
एकमात्र साधन यह कलि में, शास्त्र संत का यही विधान 

Jagat Main Jivan Do Din Ka

नश्वर संसार
जगत् में जीवन दो दिन का
पाप कपट कर माया जोड़ी, गर्व करे धन का
सभी छोड़कर चला मुसाफिर, वास हुआ वन का
सुन्दर काया देख लुभाया, लाड़ करे इसका
श्वास बन्द हो बिखरे देही, ज्यों माला मनका
यह संसार स्वप्न की माया, मिलना कुछ दिन का
‘ब्रह्मानंद’ भजन कर ले तूँ, जपो नाम हरि का