Bhaj Man Ram Charan Sukh Dai

भज मन राम-चरण सुखदाई
जिहि चरनन ते निकसी सुर-सरि, शंकर-जटा समाई
जटा शंकरी नाम पर्यो है, त्रिभुवन तारन आई
जिन चरनन की चरन-पादुका, भरत रह्यो लवलाई
सोई चरन केवट धोइ लीन्हे, तब हरि नाव चढ़ाई
सोई चरन संतन जन सेवत, सदा रहत सुखदाई
सोई चरन गौतम ऋषि-नारी, परसि परम पद पाई
दंडक वन प्रभु पावन कीन्हो, ऋषि मन त्रास मिटाई
सोई प्रभु त्रिलोक के स्वामी, कनक मृगा सँग धाई
कपि सुग्रीव बन्धु भय व्याकुल, तब जय छत्र फिराई
रिपु को अनुज विभीषण निसिचर, परसत लंका पाई
शिव सनकादिक अरु ब्रह्मादिक, शेष सहस मुख गाई
‘तुलसिदास’ मारुत-सुत की प्रभु, निज मुख करत बड़ाई

Kaha Sukh Braj Ko So Sansar

ब्रज-महिमा
कहाँ सुख ब्रज कौ सौ संसार
कहाँ सुखद बंसी-वट जमुना, यह मन सदा विचार
कहाँ बन धाम कहाँ राधा सँग, कहाँ संग ब्रज वाम
कहाँ विरह सुख बिन गोपिन सँग, ‘सूर’ स्याम मन साम

Jo Sukh Braj Me Ek Ghari

ब्रज का सुख
जो सुख ब्रज में एक घरी
सो सुख तीनि लोक में नाहीं, धनि यह घोष पुरी
अष्ट सिद्धि नव निधि कर जोरे, द्वारैं रहति खरी
सिव-सनकादि-सुकादि-अगोचर, ते अवतरे हरी
धन्य धन्य बड़ भागिनि जसुमति, निगमनि सही परी
ऐसे ‘सूरदास’ के प्रभु को, लीन्हौ अंक भरी

Jo Sukh Hot Gopalhi Gaye

गोपाल का गुणगान
जो सुख होत गोपालहिं गाये
सो न होत जपतप व्रत संयम, कोटिक तीरथ न्हाये
गदगद गिरा नयन जल धारा, प्रेम पुलक तनु छाये
तीन लोक सुख तृणवत लेखत, नँद-नंदन उर आये
दिये लेत नहिं चार पदारथ, हरि चरणन अरुझाये
‘सूरदास’ गोविन्द भजन बिनु, चित नहीं चलत चलाये

Mero Man Anat Kahan Sukh Pawe

अद्वितीय प्रेम
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै
जैसे उड़ि जहाज को पंछी, फिरि जहाज पर आवै
कमल नैन को छाड़ि महातम और दैव को ध्यावै
परम गंग को छाड़ि पियासों, दुर्मति कूप खनावै
जिहिं मधुकर अंबुज रस चाख्यौ, क्यों करील-फल खावै
‘सूरदास’ प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै

Tumhare Kaaran Sab Sukh Chodya

विरह व्यथा
तुम्हरे कारण सब सुख छोड्यो, अब मोहि क्यूँ तरसावो
बिरह व्यथा लागी उर अंदर, सो तुम आय बुझावो
अब छोड्याँ नहिं बनै प्रभूजी, हँस कर तुरत बुलाओ
‘मीराँ’ दासी जनम जनम की, अंग सूँ अंग लगाओ

Ek Aur Vah Kshir Nir Main Sukh Se Sowen

श्री राधाकृष्ण
एक ओर वह क्षीर नीर में, सुख से सोवैं
करि के शैया शेष लक्ष्मीजी, जिन पद जोवैं
वे ही राधेश्याम युगल, विहरत कुंजनि में
लोकपाल बनि तऊ चरावत, धेनु वननि में
निज ऐश्वर्य भुलाय कें, करैं अटपटे काम है
तेज पुंज उन कृष्ण को, बारम्बार प्रणाम है

Radha Ras Ki Khani Sarasta Sukh Ki Beli

श्री राधा
राधा रस की खानि, सरसता सुख की बेली
नन्दनँदन मुखचन्द्र चकोरी, नित्य नवेली
नित नव नव रचि रास, रसिक हिय रस बरसावै
केलि कला महँ कुशल, अलौकिक सुख सरसावै
यह अवनी पावन बनी, राधा पद-रज परसि के
जिह राज सुरगन इन्द्र अज, शिव सिर धारें हरषि के

Karuna Ke Sukh Sagar Data

श्रीराम प्राकट्य
करुणा के सागर, सुखदाता, यश गाये जिनका वेद संत
श्यामल सुन्दर राजीव नयन, शोभा-सागर कीरति अनन्त
माँ कौसल्या ने जन्म दिया, आयुध है चार भुजाओं में
भूषण गल माला अद्वितीय, हर्षित सब ऋषि मुनि सुर मन में
अवतार लिया दशरथ सुत हो, शिशु रूप धरा तब राघव ने
प्रिय लीला करने लगे तभी, माता को सुख प्रदान करने
मैं बारम्बार प्रणाम करूँ, शिशु राघव के श्री चरणों में
जिनका है रूप अनूप वही, छवि बस जाये मेरे उर में

Karmo Ka Fal Hi Sukh Dukh Hai

कर्म-फल
कर्मों का फल ही सुख दुख है
जिसने जैसा हो कर्म किया, उसका फल वह निश्चित पायेगा
जो कर्म समर्पित प्रभु को हो, तो वह अक्षय हो जायेगा
जो भी ऐसा सत्कर्मी हो, वह उत्तम गति को पायेगा
जो व्यक्ति करे निष्काम कर्म, सर्वथा आश्रित प्रभु के ही
ऐसे भक्तों का निस्संदेह, उद्धार स्वयं प्रभु करते ही