Chalo Re Man Jamna Ji Ke Tir

यमुना का तीर
चलो रे मन जमनाजी के तीर
जमनाजी को निरमल पाणी, सीतल होत शरीर
बंसी बजावत गावत कान्हो, संग लिये बलबीर
मोर मुकुट पीताम्बर सोहे, कुण्डल झलकत हीर
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कँवल पर सीर

Thane Kai Kai Samjhawan

विरह व्यथा
थाने काँईं काँईं समझाँवा, म्हारा साँवरा गिरधारी
पुरब जनम की प्रीत हमारी, अब नहीं जाय बिसारी
रोम रोम में अँखियाँ अटकी, नख सिख की बलिहारी
सुंदर बदन निरखियो जब ते, पलक न लागे म्हाँरी
अब तो बेग पधारो मोहन, लग्यो उमावो भारी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, सुधि लो तुरत ही म्हारी

Pyari Darsan Dijyo Aay

विरह व्यथा
प्यारे दरसन दीज्यो आय, तुम बिन रह्यो न जाय
जल बिन कमल, चंद बिन रजनी, ऐसे तुम देख्या बिन सजनी
आकुल-व्याकुल फिरूँ रैन-दिन, विरह कलेजो खाय
दिवस न भूख, नींद नहिं रैना, मुख सूँ कथत न आवै बैना
कहा कहूँ कछु कहत न आवे, मिलकर तपत बुझाय
क्यूँ तरसाओ अंतरजामी, आय मिलो किरपा कर स्वामी
‘मीराँ’ दासी जनम जनम की, पड़ी तिहारे पाँय

Meera Magan Hari Ke Gun Gay

मग्न मीरा
मीराँ मगन हरि के गुण गाय
साँप-पिटारा राणा भेज्या, मीराँ हाथ दियो जाय
न्हाय धोय जब देखण लागी, सालिगराम गई पाय
जहर को प्याला राणाजी भेज्या, अमृत दियो बनाय
न्हाय धोय जब पीवण लागी, हो गई अमर अँचाय
सूल सेज राणाजी भेजी, दीज्यो मीराँ सुलाय
साँझ भई मीराँ सोवण लागी, मानो फूल बिछाय
‘मीराँ’ के प्रभु सदा सहाई, राखो विघन हटाय
भजन भाव में मगन डोलती, गिरिधर पै बलि जाय

Mhare Ghar Aao Pritam Pyara

आओ प्रीतम
म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा, जग तुम बिन लागे खारा
तन-मन धन सब भेंट धरूँगी, भजन करूँगी तुम्हारा
तुम गुणवंत सुसाहिब कहिये, मोमें औगुण सारा
मैं निगुणी कछु गुण नहिं जानूँ, ये सब बगसण हारा
‘मीराँ’ कहे प्रभु कब रे मिलोगे, तुम बिन नैण दुखारा

Sanwara Mhari Prit Nibhajyo Ji

शरणागति
साँवरा म्हारी प्रीत निभाज्यो जी
थें छो सगला गुण रा सागर, म्हारा औगुण थे बिसराज्यो जी
लोक न धीजै, मन न पतीजै, मुखड़े शब्द सुणाज्यो जी
दासी थारी जनम-जनम री, म्हारै आँगण आज्यो जी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, बेड़ो पार लगाज्यो जी

Chalan Vahi Des Pritam Chalan Vahi Des

प्रीतम के देश
चालाँ वाही देस प्रीतम, चालाँ वाही देस
कहो कसूमल साड़ी रँगावाँ, कहो तो भगवाँ भेस
कहो तो मोतियाँ माँग भरावाँ, कहो बिखरावाँ केस
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, सुण लो बिरद नरेस

Daras Bina Dukhan Lage Nain

विरह व्यथा
दरस बिन दूखँण लागै नैन
जब से तुम बिछुड़े मेरे प्रभुजी, कबहुँ न पायो चैन
सबद सुनत मेरी छतियाँ काँपें, कड़वे लागै बैन
विरह कथा कासूँ कहुँ सजनी, बह गई करवत ऐन
कल न परत, हरि को मग जोवत, भई छमासी रैन
‘मीरा’ के प्रभु कबरे मिलोगे, दुख मेटण सुख दैन

Prabhu Ji The To Chala Gaya Mhara Se Prit Lagay

पविरह व्यथा
प्रभुजी थें तो चला गया, म्हारा से प्रीत लगाय
छोड़ गया बिस्वास हिय में, प्रेम की बाती जलाय
विरह जलधि में छोड़ गया थें, नेह की नाव चलाय
‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, तुम बिन रह्यो न जाय

Meera Lago Rang Hari

हरि से प्रीति
‘मीराँ’ लागो रंग हरी, और न रँग की अटक परी
चूड़ो म्हाँरे तिलक अरु माला, सील बरत सिणगारो
और सिंगार म्हाँरे दाय न आवे, यो गुरू ज्ञान हमारो
कोई निंदो कोई बिंदो म्हे तो, गुण गोबिंद का गास्याँ
जिण मारग म्हाँरा साध पधारौ, उण मारग म्हे जास्याँ
चोरी न करस्याँ, जिव न सतास्याँ, काँइ करसी म्हारो कोई
गज से उतर के खर नहीं चढ्स्याँ, या तो बात न होई