Murali Adhar Saji Balbir

मोहिनी मुरली
मुरली अधर सजी बलबीर
नाद सुनि वनिता विमोहीं, बिसरे उर के चीर
धेनु मृग तृन तजि रहे, बछरा न पीबत छीर
नैन मूँदें खग रहे ज्यौं, करत तप मुनि धीर
डुलत नहिं द्रुम पत्र बेली, थकित मंद समीर
‘सूर’ मुरली शब्द सुनि थकि, रहत जमुना नीर

Maiya Ri Tu Inaka Janati

राधा कृष्ण प्रीति
मैया री तू इनका जानति बारम्बार बतायी हो
जमुना तीर काल्हि मैं भूल्यो, बाँह पकड़ी गहि ल्यायी हो
आवत इहाँ तोहि सकुचति है, मैं दे सौंह बुलायी हो
‘सूर’ स्याम ऐसे गुण-आगर, नागरि बहुत रिझायी हो

Likhi Nahi Pathwat Hain Dwe Bol

विरह व्यथा
लिखि नहिं पठवत हैं, द्वै बोल
द्वै कौड़ी के कागद मसि कौ, लागत है बहु मोल
हम इहि पार, स्याम परले तट, बीच विरह कौ जोर
‘सूरदास’ प्रभु हमरे मिलन कौं, हिरदै कियौ कठोर

Soi Rasna Jo Hari Gun Gawe

हरि भक्ति
सोइ रसना जो हरि गुन गावै
नैनन की छबि यहै चतुरता, जो मुकुन्द-मकरन्दहिं ध्यावै
निरमल चित तो सोई साँचो, कृष्ण बिना जिहिं और न भावै
श्रवननि की जु यहै अधिकाई, सुनि हरि-कथा सुधारस पावै
कर तेई जो स्यामहिं सैवै, चरननि चलि वृन्दावन जावै
‘सूरदास’ जैयै बलि ताके, जों हरि जू सों प्रीति बढ़ावै

He Govind He Gopal He Govind Rakho Sharan

शरणागति
हे गोविन्द, हे गोपाल, हे गोविन्द राखो शरण
अब तो जीवन हारे, हे गोविन्द, हे गोपाल
नीर पिवन हेतु गयो, सिन्धु के किनारे
सिन्धु बीच बसत ग्राह, चरन धरि पछारे
चार प्रहर युद्ध भयो, ले गयो मझधारे
नाक कान डूबन लागे, कृष्ण को पुकारे
द्वारका में शब्द गयो, शोर भयो भारे
शंख-चक्र, गदा-पद्म, गरूड़ ले सिधारे
‘सूर’ कहे श्याम सुनो, शरण है तिहारे
अबकी बार पार करो, नन्द के दुलारे

Chalan Vahi Des Pritam Chalan Vahi Des

प्रीतम के देश
चालाँ वाही देस प्रीतम, चालाँ वाही देस
कहो कसूमल साड़ी रँगावाँ, कहो तो भगवाँ भेस
कहो तो मोतियाँ माँग भरावाँ, कहो बिखरावाँ केस
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, सुण लो बिरद नरेस

Daras Mhane Bega Dijyo Ji

विरह व्यथा
दरस म्हाने बेगा दीज्यो जी, खबर म्हारी बेगी लीज्यो जी
आप बिना मोहे कल न पड़त है, म्हारा में गुण एक नहीं है जी
तड़पत हूँ दिन रात प्रभुजी, सगला दोष भुला दिज्यो जी
भगत-बछल थारों बिरद कहावे, श्याम मोपे किरपा करज्यो जी
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, आज म्हारी लाज राखिज्यो जी

Bansiwala Aajo Mhare Des

विरह व्यथा
बंसीवाला आजो म्हारे देस, थाँरी साँवरी सूरति वालो भेष
आऊगा कह गया साँवरा, कर गया कौल अनेक
गणता गणता घिस गई म्हारी, आँगुलिया की रेख
तेरे कारण साँवराजी, धर लियो जोगण भेष
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, आओ मिटे कलेस

Muraliya Baji Jamna Teer

मुरली की मोहिनी
मुरलिया बाजी जमना तीर
मुरली म्हारो मन हर लीन्हों, चित्त धरे नहीं धीर
स्याम कन्हैया स्याम कमरिया, स्याम ही जमुना नीर
मुरली धुन सुण सुध बुध बिसरी, शीतल होत सरीर
‘मीराँ’ के प्रभु गुरुधर नागर, बेग हरो म्हारी पीर

Rana Ji Ab Na Rahungi Tori Hatki

वैराग्य
राणाजी! अब न रहूँगी तोरी हटकी
साधु-संग मोहि प्यारा लागै, लाज गई घूँघट की
पीहर मेड़ता छोड्यो अपनो, सुरत निरत दोउ चटकी
सतगुरु मुकर दिखाया घट का, नाचुँगी दे दे चुटकी
महल किला कुछ मोहि न चहिये, सारी रेसम-पट की
भई दिवानी ‘मीराँ’ डोलै, केस-लटा सब छिटकी