He Sakhi Sun To Vrindawan Main

वृंदावन केलि
हे सखि सुन तो वृन्दावन में, बंसी श्याम बजावत है
सब साधु संत का दुख हरने, ब्रज में अवतार लिया हरि ने
वो ग्वाल-बाल को संग में ले, यमुना-तट धेनु चरावत है
सिर मोर-पंख का मुकुट धरे, मकराकृत कुण्डल कानों में
वक्षःस्थल पे वनमाल धरे, कटि में पट पीत सुहावत है
वृन्दावन में हरि रास करे, गोपिन के मन आनंद भरे
सब देव समाज जुड़े नभ में, ‘ब्रह्मानंद’ घना सुख पावत है

Ari Sakhi Rath Baithe Giridhari

रथ-यात्रा
अरी सखि रथ बैठे गिरिधारी
राजत परम मनोहर सब अँग, संग राधिका प्यारी
मणि माणिक हीरा कुन्दन से, डाँडी चार सँवारी
अति सुन्दर रथ रच्यो विधाता, चमक दमक भी भारी
हंस गति से चलत अश्व है, उपजत है छबि न्यारी
विहरत वृन्दावन बीथिन में, ‘परमानन्द’ बलिहारी

Aaj Sakhi Raghav Ki Sudhi Aai

स्मृति
आज सखि! राघव की सुधि आई
आगे आगे राम चलत है, पीछे लक्ष्मण भाई
इनके बीच में चलत जानकी, चिन्ता अधिक सताई
सावन गरजे भादों बरसे,पवन चलत पुरवाई
कौन वृक्ष तल भीजत होंगे, राम लखन दोउ भाई
राम बिना मोरी सूनी अयोध्या, लक्ष्मण बिन ठकुराई
सीता बिन मोरी सूनी रसोई, महल उदासी छाई

Aaj Sakhi Nandnandan Pragate

श्रीकृष्ण प्राकट्य
आजु सखी, नँद-नंदन प्रगटे, गोकुल बजत बधाई री
कृष्णपक्ष की अष्टमी भादौ, योग लग्न घड़ी आई री
गृह-गृह ते सब बनिता आई, गावत गीत बधाई री
जो जैसे तैसे उठि धाई, आनन्द उर न समाई री
चौवा चन्दन और अरगजा, दधि की कीच मचाई री
बन्दीजन सुर नर गुन गावें, शोभा बरनि न जाई री
‘चन्द्रसखी’ भज बालकृष्ण छबि, चरन कमल चित लाई री  

Aaj Sakhi Rath Baithe Nandlal

रथ-यात्रा
आज सखी, रथ बैठे नंदलाल
अति विचित्र पहिरे पट झीनो,उर सोहत वन-माल
वामभाग वृषभानु-नंदिनी, पहिर कसूंभी सारी
तैसोई घन उमड्यो चहुँ दिशि, गरजत है अति भारी
सुन्दर रथ मणि-जटित मनोहर, अनुपम है सब साज
चपल तुरंग चलत धरणी पे, रह्यो घोष सब गाज
ताल पखावज बीन बाँसुरी, बाजत परम रसाल
‘गोविंददास’ प्रभु पे बरखत, विविध कुसुम ब्रजबाल

Chalo Ri Sakhi Nand Bhawan Ko Jayen

प्रभाती
चलोरी सखि, नन्द भवन को जायें
मिले श्याम सुन्दर का दर्शन, जीवन की निधि पायें
प्रातः काल भयो सखि माँ लाला को रही जगाये
उबटन लगा लाल को मैया, अब उसको नहलाये
स्नेह भाव जसुमति के मन में, नवनीत उसे खिलाये
केश सँवार नयन में काजल, माथे तिलक लगाये
रेशम को जामा पहनाकर, स्नेह से उसे सजाये
कटि करधनी पैंजनी रुनझुन, लाला के मन भाये
किलकारी की मधुर ध्वनि सुन, माँ प्रसन्न हो जाये
भाग्यवान सखि गोकुलवासी, बालकृष्ण को पाये 

Sakhi Ri Sundarta Ko Rang

दिव्य सौन्दर्य
सखी री सुन्दरता को रंग
छिन-छिन माँहि परत छबि औरे, कमल नयन के अंग
स्याम सुभग के ऊपर वारौं, आली, कोटि अनंग
‘सूरदास’ कछु कहत न आवै, गिरा भई अति पंग

Dhanya Sakhi Suno Jasoda Maiya

बालकृष्ण चरित
धन्य सखी सुनो जसोदा मैया
घुँटुरन चलत बालकृष्ण अति कोमल नन्हें पैया
मनमोहन को रूप रसीलो, गोपीजन मन भावत
बारंबार कमल मुख निरखत, नंदालय सब आवत
किलकि किलकि हुलसत है लालन, भगत बछल मनरंजन
देत असीस सबहि गोपीजन, चिरजीवो दुख-भंजन 

Sun Ri Sakhi Bat Ek Mori

ठिठोली
सुन री सखी, बात एक मेरी
तोसौं धरौं दुराई, कहौं केहि, तू जानै सब चित की मेरी
मैं गोरस लै जाति अकेली, काल्हि कान्ह बहियाँ गही मेरी
हार सहित अंचल गहि गाढ़े, इक कर गही मटुकिया मेरी
तब मैं कह्यौ खीझि हरि छोड़ौ, टूटेगी मोतिन लर मेरी
‘सूर’ स्याम ऐसे मोहि रीझयौ, कहा कहति तूँ मौसौं मेरी

Main Bhul Gai Sakhi Apne Ko

गोपी की प्रीति
मैं भूल गई सखि अपने को
नित्य मिलन का अनुभव करती, जब से देखा मोहन को
प्रात: संध्या दिवस रात का, भान नहीं रहता मुझको
सपने में भी वही दिखता, मन की बात कहूँ किसको
कैसी अनुपम मूर्ति श्याम की, कैसा मनहर उसका रूप
नयन हुए गोपी के गीले, छाया मन सौन्दर्य अनूप
रही न सुधि उसको अपनी कुछ, चूर्ण हुआ सारा अभिमान
लोकलाज मर्यादा का तब, रहा न उसको कुछ भी भान