Sakhi Ri Sundarta Ko Rang

दिव्य सौन्दर्य
सखी री सुन्दरता को रंग
छिन-छिन माँहि परत छबि औरे, कमल नयन के अंग
स्याम सुभग के ऊपर वारौं, आली, कोटि अनंग
‘सूरदास’ कछु कहत न आवै, गिरा भई अति पंग

Dhanya Sakhi Suno Jasoda Maiya

बालकृष्ण चरित
धन्य सखी सुनो जसोदा मैया
घुँटुरन चलत बालकृष्ण अति कोमल नन्हें पैया
मनमोहन को रूप रसीलो, गोपीजन मन भावत
बारंबार कमल मुख निरखत, नंदालय सब आवत
किलकि किलकि हुलसत है लालन, भगत बछल मनरंजन
देत असीस सबहि गोपीजन, चिरजीवो दुख-भंजन 

Sun Ri Sakhi Bat Ek Mori

ठिठोली
सुन री सखी, बात एक मेरी
तोसौं धरौं दुराई, कहौं केहि, तू जानै सब चित की मेरी
मैं गोरस लै जाति अकेली, काल्हि कान्ह बहियाँ गही मेरी
हार सहित अंचल गहि गाढ़े, इक कर गही मटुकिया मेरी
तब मैं कह्यौ खीझि हरि छोड़ौ, टूटेगी मोतिन लर मेरी
‘सूर’ स्याम ऐसे मोहि रीझयौ, कहा कहति तूँ मौसौं मेरी

Main Bhul Gai Sakhi Apne Ko

गोपी की प्रीति
मैं भूल गई सखि अपने को
नित्य मिलन का अनुभव करती, जब से देखा मोहन को
प्रात: संध्या दिवस रात का, भान नहीं रहता मुझको
सपने में भी वही दिखता, मन की बात कहूँ किसको
कैसी अनुपम मूर्ति श्याम की, कैसा मनहर उसका रूप
नयन हुए गोपी के गीले, छाया मन सौन्दर्य अनूप
रही न सुधि उसको अपनी कुछ, चूर्ण हुआ सारा अभिमान
लोकलाज मर्यादा का तब, रहा न उसको कुछ भी भान

Braj Me Aaj Sakhi Dekhyo Ri Tona

श्याम का जादू
ब्रज में आज सखी देख्यो री टोना
ले मटकी सिर चली गुजरिया, आगे मिले बाबा नंद का छोना
दधि को नाम बिसरि गयो प्यारी, ले लेहुरी कोउ स्याम सलोना
वृन्दावन की कुंज गलिन में, आँख लगाय गयो मन-मोहना
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, सुन्दर श्याम सुधर रस लोना

Sakhi Aayo Fagun Mas

होली
सखि, आयो फागुन मास, चलों हम खेलें होरी
गोपी-जन को कहें प्रेम से राधा गोरी
इतने में ज्यों दिखे श्याम, गोपियाँ दौड़ी आई
कहाँ छिपे थे प्यारे अब तक कृष्ण कन्हाई
घेर श्याम को होरी की फिर धूम मचाई
सब मिलकर डाले रंग उन्हीं पर, सुधि बिसराई
मौका पा पकड़े मोहन राधा रानी को
तत्काल ही डाला रंग गुलाल, नहीं छोड़ा उनको
आनन्द मग्न सब हुए, राधिका मुरलीधर भी
यह जोड़ी कितनी प्यारी, मुग्ध हैं गोपीजन भी

Sakhi Meri Nind Nasani Ho

विरह व्यथा
सखी, मेरी नींद नसानी हो
पिव को पंथ निहारत सिगरी, रैण बिहानी हो
सखियन मिल कर सीख दई मन, एक न मानी हो
बिन देख्याँ कल नाहिं पड़त, जिय ऐसी ठानी हो
अंग-अंग व्याकुल भये मुख ते, पिय पिय बानी हो
अंतर-व्यथा विरह की कोई, पीर न जानी हो
चातक जैहि विधि रटे मेघ कूँ, मछली जिमि पानी हो
‘मीराँ’ अति अधीर विरहिणी, सुध-बुध बिसरानी हो

Sakhi Mohan Sang Mouj Karen

फागुन का रंग
सखि, मोहन सँग मौज करें फागुन में
मोहन को घरवाली बना के, गीत सभी मिल गाएँ री, फागुन में
पकड़ श्याम को गलियन डोलें, ताली दे दे नाच नचाएँ
मस्ती को कोई न पार आज, फागुन में
हम रसिया तुम मोहन गोरी, कैसी सुन्दर बनी रे जोरी
जोरी को नाच नचाओ रे, फागुन में
करे आज मनमानी तुमसे, कुछ न कहोगे फिर भी हमसे
वरना तो होगी, बरजोरी फागुन में
करे आज मनमानी तुमसे, कुछ न कहोगे फिर भी हमसे
वरना तो होगी, बरजोरी फागुन में

Sakhi Mharo Kanho Kaleje Ki Kor

प्राणनाथ कन्हैया
सखी म्हारो कान्हो कलेजे की कोर
मोर मुकुट पीतांबर सोहे, कुण्डल की झकझोर
वृंदावन की कुञ्ज-गलिन में, नाचत नंदकिशोर
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कँवल चितचोर

Sakhi Ye Naina Bahut Bure

प्रीति माधुर्य
सखि, ये नैना बहुत बुरे
तब सौं भये पराये हरि सो, जबलौं जाई जुरे
मोहन के रस बस ह्वै डोलत, जाये न तनिक दुरे
मेरी सीख प्रीति सब छाँड़ी, ऐसे ये निगुरे
खीझ्यौ बरज्यौ पर ये नाहीं, हठ सो तनिक मुरे
सुधा भरे देखत कमलन से, विष के बुझे छुरे