Shri Krishna Chandra Mathura Ko Gaye

विरह व्यथा
श्री कृष्णचन्द्र मथुरा को गये, गोकुल को आयबो छोड़ दियो
तब से ब्रज की बालाओं ने, पनघट को जायबो छोड़ दियो
सब लता पता भी सूख गये, कालिंदी किनारो छोड़ दियो
वहाँ मेवा भोग लगावत हैं, माखन को खायबो छोड़ दियो
ये बीन पखावज धरी रहैं, मुरली को बजायबो छोड़ दियो
वहाँ कुब्जा संग विहार करें, राधा-गुन गायबो छोड़ दियो
वे कंस को मार भये राजा, गउअन को चरायबो छोड़ दियो
‘सूर’ श्याम प्रभु निठुर भये, हँसिबो इठलाइबो छोड़ दियो

Bhagwan Krishna Lilamrut Ka

ब्रह्माजी का भ्रम
भगवान् कृष्णलीलामृत का, हम तन्मय होकर पान करें
ब्रह्मा तक समझ नहीं पाये, उन सर्वात्मा का ध्यान धरें
यमुनाजी का रमणीय-पुलीन, जहाँ ग्वाल बाल भी सँग में हैं
मंडलाकार आसीन हुए, भगवान् बीच में शोभित हैं
बछड़े चरते थे हरी घास, मंडली मग्न थी भोजन में
भगवान कृष्ण की लीला से, ब्रह्मा भी पड़े अचम्भे में
मौका पाकर के ब्रह्मा ने, अन्यत्र छिपाया बछड़ों को
दधि-भात-कौर को हाथ लिये, श्रीकृष्ण ढूँढते तब उनको
अवसर का लाभ उठा ब्रह्मा ने, ग्वाल बाल भी छिपा दिये
खिलवाड़ चला यह एक वर्ष, कोई न समझ इसको पाये
ब्रह्माजी को जब ज्ञान हुआ, गिर पड़े प्रभु के चरणों में
तन मन उनका रोमांचित था, अरु अश्रु भरे थे नैनों में

Ankhiyan Krishna Milan Ki Pyasi

विरह व्यथा
अँखियाँ कृष्ण मिलन की प्यासी
आप तो जाय द्वारका छाये, लोग करत मेरी हाँसी
आम की दार कोयलिया बोलै, बोलत सबद उदासी
मेरे तो मन ऐसी आवै, करवत लेहौं कासी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल की दासी

Bhagwan Radha Krishna Karuna Kar

प्रार्थना
भगवान् राधाकृष्ण करुणा कर मुझे अपनाइये
संसार-सागर में पड़ा, अविलम्ब आप बचाइये
धन बंधु बांधव मोह माया, जाल में हूँ मैं फँसा
आसक्ति से कर मुक्त, जीवन पर सुधा बरसाइये
प्रभु दोष मेरे अनगिनत, अपराध का भण्डार हूँ
गति हीन, साधन हीन के, सब क्लेश कष्ट निवारिये
मैं प्रिया प्रियतम राधिका श्री कृष्ण का चिन्तन करूँ
तन-मन वचन से आपका ही, हे शरण्य उबारिये
प्रभु दिव्य वृन्दावन-बिहारी के चरण में प्रार्थना
मुझ को बना कर दास अपना, विरुद आप निभाइये

Aur Ansha Avtar Krishna Bhagwan Swayam Hai

परब्रह्म श्री कृष्ण
और अंश अवतार कृष्ण भगवान स्वयम् हैं
वे मानुस बनि गये, यशोदा नन्द-नँदन हैं
सकल भुवन के ईश एक, आश्रय वनवारी
मोर मुकुट सिर धारि अधर, मुरली अति प्यारी
रस सरबस श्रृंगार के, साक्षात् श्रृंगार हैं
जो विभु हैं, आनन्दघन, उन प्रभु की हम शरन हैं

Main Krishna Nam Ki Chudiyan Pahanu

भरतार श्याम
मैं कृष्ण नाम की चुड़ियाँ पहनूँ, आँख में कजरा डार
गले में मोतियन माला पहनूँ, उनके हित श्रंगार
ऐसे जन को नहीं वरूँ मैं, जो कि जिये दिन चार
मेरे तो भरतार श्याम हैं, उन सँग करूँ विहार
करूँ निछावर जीवन सारा, वे ही प्राणाधार
स्वत्व मिटे, कुछ रहे न मेरा, माया मोह निवार

Re Man Krishna Nam Jap Le

श्री कृष्ण स्मरण
रे मन कृष्ण नाम जप ले
भटक रहा क्यों इधर उधर तू, कान्ह शरण गह ले
जनम मरण का चक्कर इससे, क्यों न मुक्त हो जाये
यह संसार स्वप्न के जैसा, फिर भी क्यों भरमाये
जिनको तू अपना है कहता, कोई भी नहीं तेरा
मनमोहन को हृदय बिठाले, चला चली जग फेरा

Maine Mehandi Rachai Krishna Nam Ki

श्रीकृष्ण से प्रीति
मैंनें मेंहदी रचाई कृष्ण नाम की,
मैंने बिंदिया सजाई कृष्ण नाम की
मेरी चूड़ियों में कृष्ण, मेरी चुनरी में कृष्ण,
मैंने नथनी घढ़ाई कृष्ण नाम की
मेरे नयनों में गोकुल, वृंदावन,
मेरे प्राणों में मोहन मन-भावन
मेरे होठों पे कृष्ण, मेरे हृदय में कृष्ण,
मैंने ज्योति जगाई कृष्ण नाम की
अब छाया है कृष्ण मेरे अंग-अंग में,
मेरा तन-मन रंगा है श्री कृष्ण रंग में
मेरा प्रीतम है कृष्ण, मेरा जीवन है कृष्ण
मैंने माला बनाई कृष्ण नाम की

Ab Man Krishna Krishna Kahi Lije

श्रीकृष्ण स्मरण
अब मन कृष्ण कृष्ण कहि लीजे
कृष्ण कृष्ण कहि कहिके जग में, साधु समागम कीजे
कृष्ण नाम की माला लेके, कृष्ण नाम चित दीजे
कृष्ण नाम अमृत रस रसना, तृषावंत हो पीजै
कृष्ण नाम है सार जगत् में, कृष्ण हेतु तन छीजे
‘रूपकुँवरि’ धरि ध्यान कृष्ण को, कृष्ण कृष्ण कहि लीजे 

Ram Krishna Kahiye Uthi Bhor

राम कृष्ण चरित्र
राम कृष्ण कहिये उठि भोर
श्री राम तो धनुष धरे हैं, श्री कृष्ण हैं माखन चोर
उनके छत्र चँवर सिंहासन, भरत, शत्रुघन, लक्ष्मण जोर
इनके लकुट मुकुट पीतांबर, नित गैयन सँग नंद-किशोर
उन सागर में सिला तराई, इन राख्यो गिरि नख की कोर
‘नंददास’ प्रभु सब तजि भजिए, जैसे निरखत चंद चकोर