Janani Janki Jad Jivani Dhing Chyon Tum Aayi

श्री जानकी स्तुति
जननि जानकी! जड़ जीवनि ढिँग च्यौं तुम आयीं
च्यौं अति करुनामयी दुखद लीला दरसायीं
तब करुना के पात्र अज्ञ, जड़ जीव नहीं माँ
करुनावश ह्वै जगत हेतु, अति विपति सहीं माँ
हाय! कहाँ अति मृदुल पद, कहँ कंकड़युत पथ विकट
ह्वैकें अति प्रिय राम की, रहि न सकीं तिनके निकट

Durga Devi Daya Karahu

श्री दुर्गा स्तुति
दुर्गा देवी दया करहु, दुख दुरित नसाओ
शक्ति हीन संतान परी माँ! आय जगाओ
भये भवानी भीत, आय भय भूत भगाओ
खड्ग हाथ महँ देहु, युद्ध को पाठ पढ़ाओ
कलि कराल कलुषित करहिँ, करि कल्यान कपर्दिनी
मेटो ममता मोह कूँ, महिषासुर मद मर्दिनी

Dhani Dhani Vrindawan Var Dham

श्री वृन्दावन धाम
धनि धनि वृन्दावन वर धाम
भौतिकता तो नहीं जरा भी, जग प्रपंच को नहिं कछु काम
श्यामा श्याम केलि थल अनुपम, नित नूतन क्रीड़ा अभिराम
लाड़ लड़ावति लली लालकूँ, राग भोग तजि और न काम
पालन सृजन प्रलय देवन को, काम करें अज हरि हर नाम
नित्य किशोर किशोरी संग में, रचै रास नहिं छन विश्राम

Dhuri Dhusrit Nil Kutil Kach Kare Kare

अन्तर्धान लीला
धुरि धूसरित नील कुटिल कच, कारे कारे
मुखपै बिथुरे मधुर लगें, मनकूँ अति प्यारे
झोटा खात बुलाक, मोर को मुकुट मनोहर
ऐसो वेष बनाइ जाउ जब, बन तुम गिरिधर
तब पल-पल युग-युग सरिस, बीतत बिनु देखे तुम्हें
अब निशिमहँ बन छाँड़ि तुम, छिपे छबीले छलि हमें

Nand Ghar Aaj Bhayo Anand

श्री कृष्ण प्राकट्य
नन्द घर आज भयो आनन्द
मातु यशोदा लाला जायो, ज्यों पूनों ने चन्द
गोपी गोप गाय गायक-गन, सब हिय सरसिज वृन्द
नन्दनँदन रवि उदित भये हिय, विकसे पंकज वृन्द
वसुधा मुदित समीर बहत वर, शीतल मन्द सुगन्ध
गरजत मन्द मन्द घन नभ महँ, प्रकटे आनँद कन्द
माया बन्धु सिन्धु सब सुख के, स्वयं सच्चिदानन्द
‘प्रभु’ के प्रभु विभु विश्वविदित वर, काटैं यम के फन्द

Nath Tav Charan Sharan Main Aayo

शरणागति
नाथ तव चरण शरन में आयो
अब तक भटक्यो भव सागर में, माया मोह भुलायो
कर्म फलनि की भोगत भोगत, कईं योनिनि भटकायो
पेट भयो कूकर सूकर सम, प्रभु-पद मन न लगायो
भई न शान्ति, न हिय सुख पायो, जीवन व्यर्थ गँवायो
‘प्रभु’ परमेश्वर पतति उधारन, शरनागत अपनायो

Nek Thaharija Shyam Bat Ek Suni Ja Mori

राधा के श्याम
नेंक ठहरि जा श्याम! बात एक सुनि जा मेरी
दौर्यो जावै कहाँ, दीठि चंचल अति तोरी
ब्रज में मच्यो चवाउ, बात फैली घर-घर में
कीरति रानी लली धँसी है, तेरे उर में
निज नयननि निरख्यो न कछु, सुन्यो सुनायो ही कह्यो
गोरी भोरी छोहरी, को चेरो तू बनि गयो

Param Dham Saket Ayodhya

श्री अयोध्या धाम
परम धाम साकेत अयोध्या, सुख सरसावनि
हरन सकल सन्ताप, जगत के दुःख नसावनि
सरयू को शुभ नीर, पीर सबई हरि लेवै
हियकूँ शीतल करै अन्त में, प्रभु पद देवै
करें धाम मँह बास जे, ते निश्चत तरि जायँगे
कामी सब अघ मेंटि कें, धाम प्रभाव दिखायँगे

Aao Aao Shyam Hraday Ki Tapan Bujhao

हृदय की तपन
आओ आओ श्याम, हृदय की तपन बुझाओ
चरण कमल हिय धरो, शोक संताप नसाओ
यों कहि रोई फूटि-फूटि के, गोपी सस्वर
रहि न सके तब श्याम भये, प्रकटित तहँ सत्वर
मदन मनोहर वेष तैं, मनमथ के मनकूँ करत
प्रकटे प्रभु तिन मध्य में, शोक मोह हियको हरत

Bin Kaju Aaj Maharaj Laj Gai Meri

द्रोपदी का विलाप
बिन काज आज महाराज लाज गई मेरी
दुख हरो द्वारिकानाथ शरण मैं तेरी
दुःशासन वंश कठोर, महा दुखदाई
खैंचत वह मेरो चीर लाज नहिं आई
अब भयो धर्म को नास, पाप रह्यो छाई
यह देख सभा की ओर नारि बिलखाई
शकुनि दुर्योधन, कर्ण खड़े खल घेरी
दुख हरो द्वारिकानाथ शरण मैं तेरी
तुम दीनन की सुध लेत देवकी-नन्दन
महिमा अनन्त भगवन्त भक्त-भय भंजन
तुम कियो सिया दुख दूर शम्भु-धनु खण्डन
अति आर्ति-हरण गोपाल मुनिन मन-रंजन
करुणानिधान भगवान करी क्यों देरी
दुख हरो द्वारिकानाथ शरण में तेरी
बैठा जहाँ राज समाज, नीति सब खोई
नहिं कहत धर्म की बात सभा में कोई
पाँचो पति बैठे मौन कौन गति होई
ले नन्दनँदन को नाम द्रोपदी रोई
करि करि विलाप सन्ताप सभा में हेरी
दुख हरो द्वारिकानाथ शरण मैं तेरी
तुम सुनी गजेन्द्र की टेर, विष्णु अनिवासी
ग्रह मारि छुड़ायो बन्दि काटि पग फाँसी
मै जपूँ तुम्हारो नाम द्वारिका वासी
अब काहे राज समाज करावत हाँसी
अब कृपा करो यदुनाथ जान चित चेरी
दुख हरो द्वारिकानाथ शरण में तेरी