Avatarit Hue Bhagwan Krishna

श्रीकृष्ण प्राकट्य
अवतरित हुए भगवान कृष्ण, पृथ्वी पर मंगल छाया है
बज गई स्वर्ग की दुन्दुभियाँ,चहुँ दिशि आनन्द समाया है
था गदा, चक्र अरु कमल, शंख, हाथों में शोभित बालक के
श्रीवत्स चिन्ह वक्षःस्थल पे, कटि में भी पीताम्बर झलके
वसुदेव देवकी समझ गये, यह परमपुरुष पुरुषोत्तम है
जो पुत्र रूप में प्राप्त हुआ, साक्षात् वही विश्वात्मा है
होकर प्रसन्न दोनों ही ने, तब हाथ जोड़ स्तवन किया
तभी योगमाया से हरि ने, औसत शिशु का रूप लिया
बालक की तब रक्षा करने, वसुदेव ले गये गोकुल को
उस समय यशोदा मैया ने, वहाँ जन्म दिया था कन्या को
वसुदेव ने उसको उठा लिया, वहीं बालकृष्ण को सुला दिया
कन्या को ले मथुरा लौटे, देवकी-शैया पर लिटा दिया

Shri Krishna Ka Virah

श्री चैतन्य महाप्रभु
श्री कृष्ण का विरह आपको आठों ही प्रहर सताये
श्री महाप्रभु चैतन्य वही जो राधा भाव दिखाये
राधा कान्ति कलेवर अनुपम, भक्तों के मन भाये
रोम रोम में हाव भाव में, गीत कृष्ण के गाये
प्रेमावतार महाप्रभु अन्तस में, राधावर छाये
ओत प्रोत है कृष्ण-भक्ति से, जन-मन वही लुभाये

Anand Kand Shri Krishna Chandra

श्रीकृष्ण सौन्दर्य
आनन्दकन्द श्री कृष्णचन्द्र, सिर मोर-मुकुट की छवि न्यारी
मुसकान मधुर चंचल चितवन, वह रूप विलक्षण मनहारी
कटि में स्वर्णिम पीताम्बर है, शोभा अपूर्व अति सुखकारी
जो कामकला के सागर हैं, नटनागर यमुना-तट चारी
वंशी की मधुर ध्वनि करते, संग में श्री राधा सुकुमारी
गोवर्धन धारण की लीला, वर्णनातीत अति प्रियकारी
कालियानाग के मस्तक पर, वे नृत्य करें विस्मयकारी
हे नारायण, अच्युत, केशव, गोपी-वल्लभ मंगलकारी
हे कर्णधार भवसागर के, हे पूर्णकाम कलिमल हारी

Shri Krishna Chandra Madhurati Madhur

श्रीकृष्ण का माधुर्य
श्री कृष्णचन्द्र मधुरातिमधुर
है अधर मधुर मुख-कमल मधुर, चितवनी मधुर रुचि-वेश मधुर
है भृकटि मधुर अरु तिलक मधुर, सिर मुकुट मधुर कच कुटिल मधुर
है गमन मधुर अरु नृत्य मधुर, नासिका मधुर नखचन्द्र मधुर
है रमण मधुर अरु हरण मधुर, महारास मधुर संगीत मधुर
है गोप मधुर, गोपियाँ मधुर, संयोग मधुर उद्गार मधुर
है हास्य मधुर मुसकान मधुर, स्पर्श मधुर कर-कमल मधुर
गुंजा-माला, पट-पीत मधुर, यमुना-तट क्रीड़ा भ्रमण मधुर
माखन चोरी, बंशी-वादन, गोचारण गिरिधर चरित मधुर
शुचि वन-विहार रसमय लीला, अरु प्रणय-निरीक्षण भाव मधुर
राधावल्लभ घनश्याम मधुर, किंकिणी मधुर नूपुर मधुर
न्योछावर कोटि मदन शोभा, राधिका कृष्ण मधुरातिमधुर

Ek Hi Swaroop Radhika Krishna

युगल सरकार
एक ही स्वरूप राधिका कृष्ण, लीला रस हेतु ही पृथक रूप
एक प्राण हैं श्री राधा मोहन, अरु प्रीति परस्पर भी अनूप
राधा रानी है पूर्ण शक्ति, गोवर्धन-धारी शक्तिमान
श्रीकृष्ण पुकारे राधा को, मुरली में गूँजे वही तान
आह्लाद रूपिणी श्री राधा, श्री विग्रह उनका चपला सा
मुख की सुंदरता अद्वितीय और हाव-भाव लक्ष्मी जैसा
नित नूतन यौवन मन्द हास्य, गतिमान नयन मन को मोहे
उनका विशिष्ठ है अधर-राग, आभूषण अंगों पर सोहे
रासेश्वरी को शत शत प्रणाम, श्रीकृष्ण करें चिन्तन जिनका
वृषभानु-सुता का करें ध्यान, हो स्वतः गान नँदनंदन का  

Shri Krishna Kahte Raho

श्रीकृष्ण-भक्ति
श्री कृष्ण कहते रहो, अमृत-मूर्ति अनूप
श्रुति शास्त्र का मधुर फल, रसमय भक्ति स्वरूप
कर चिन्तन श्रीकृष्ण का, लीलादिक का ध्यान
अमृत ही अमृत झरे, करुणा प्रेम-निधान
कण-कण में जहाँ व्याप्त है, श्यामा श्याम स्वरूप
उस वृन्दावन धाम की, शोभा अमित अनूप
जप-तप-संयम, दान, व्रत, साधन विविध प्रकार
मुरलीधर से प्रेम ही, निगमाम का सार
जय जसुमति के लाड़ले, जय ब्रजेश नन्दलाल
वासुदेव देवकी-तनय, बालकृष्ण गोपाल
जो सुलभ्य प्रारब्ध से, उसमें कर सन्तोष
तृषा त्याग निश दिन करो, कृष्ण नाम का घोष
नाम स्मरण लवलीन हो, करलो मन को शुद्ध
अन्तकाल त्रिदोष से, कण्ठ होय अवरुद्ध
पद-सरोज में श्याम के, मन भँवरा तज आन
रहो अभी से कैद हो, अन्त समय नहीं भान
प्रेम कृष्ण का रूप है, मत कर जग से प्रेम
कृष्ण भक्ति में मन लगा, वही करेंगे क्षेम
भक्ति के आरम्भ का, पहला पद हरि-नाम
मधुसूदन श्रीकृष्ण को, भज मन आठों याम
लौकिक सुख को त्याग के, भजो सच्चिदानन्द
गोविंद के गुण-गान से, मिट जाये हर द्वन्द
श्रीराधा की भक्ति में, निहित प्यास का रूप
आदि अन्त इसमें नहीं, आनँद अमित अनूप

Kab Aaoge Krishna Murare

प्रतीक्षा
कब आओगे कृष्ण मुरारे, आस में बैठी पंथ निहारूँ
सूरज डूबा साँझ भी आई, दर पे खड़ी हूँ आस लगाये
रात हुई और तारे निकले, कब आओगे कृष्ण मुरारे
आधी रात सुनसान गली है, मैं हूँ अकेली गगन में तारे
जागा सूरज सोए तारे, कब आओगे कृष्ण मुरारे
भोर भई जग सारा जागा, हुआ प्रकाश अँधेरा भागा
देर करो मत मोहन प्यारे, कब आओगे कृष्ण मुरारे

Shri Krishna Chandra Sab Main Chaye

सर्वेश्वर श्रीकृष्ण
श्री कृष्णचन्द्र सब में छाये
जड़ चेतन प्राणीमात्र तथा कण कण में वही समाये
जो महादेव के भक्त करे, गुणगान स्तुति उसमें ये
विघ्नेश्वर गणपति रूप धरे, विघ्नों का नाश कर देते
हम दुर्गाजी का पाठ करें, होते प्रसन्न उससे भी ये
सद्बुद्धि देते सूर्यदेव, उनमें भी प्रकाशित तो ये
चाहे पूजें किसी देवता को, उनके द्वारा फल देते ये
दिन रात उन्हीं के चरणों का, ही ध्यान करें, मंगलमय ये

Kar Chintan Shri Krishna Ka

श्री राधाकृष्ण
कर चिन्तन श्रीकृष्ण का, राधावर का ध्यान
अमृत ही अमृत झरे, करुणा-प्रेम निधान
जप तप संयम दान व्रत, साधन विविध प्रकार
श्रीकृष्ण से प्रेम ही, निगमागम का सार
कृष्ण कृष्ण कहते रहो, अमृत-मूरि अनूप
श्रुति-शास्त्र का मधुर फल, रसमय भक्ति स्वरूप
श्रीराधा की भक्ति में निहित प्यास का रूप
आदि अन्त इसमें नहीं, आनन्द अमित अनूप
पद-सरोज में श्याम के, मन भँवरा तज आन
रहे अभी से कैद हो, अन्त समय नहीं भान
कृष्ण प्रिया श्री राधिके, राधा प्रिय घनश्याम
एक सहारा आपका, बंधा रहा नित काम
युगल माधुरी चित चढ़े, राधा-कृष्ण ललाम
हे करुणाकर वास दो, श्री वृन्दावन धाम
श्री वृन्दावन कुंज में, राधा-कृष्ण ललाम
क्रीड़ा नित नूतन करें, अद्वितीय अभिराम

Shri Krishna Chandra Hi Yogeshwar

योगेश्वर श्रीकृष्ण
श्री कृष्णचन्द्र ही योगेश्वर, जो सभी योगियों के योगी
अध्यात्म साधनों के द्वारा, जुड़ जाता उनसे हर योगी
भगवान कृष्ण की लीलाएँ या कर्म सभी जन हितकारी
हो कर्म, ज्ञान या भक्ति योग, गीतोपदेश मंगलकारी
जो स्वास्थ्य प्रदान करे हमको, सीमित उस तक होता न योग
सर्वत्र शांति संतोष रहे, सुख सुविधा का हो सदुपयोग
भगवान् कृष्ण हैं योगिराज, भारतवासी के कण्ठहार
संदेश-‘अहर्निश सेवा हो’ वे देते, उनको नमस्कार