Brajraj Aaj Pyare Meri Gali Me Aana

श्याम का सौन्दर्य
ब्रजराज आज प्यारे मेरी गली में आना
तेरी छबि मनोहर मुझको झलक दिखाना
सिर मोर मुकुट राजे, बनमाल उर बिराजे
नूपुर चरण में बाजे, कर में कड़ा सुहाना
कुंडल श्रवण में सोहे, बंसी अधर धरी हो
तन पीत वसन शोभे, कटि मेखला सजाना
विनती यही है प्यारे, सुन नंद के दुलारे
‘ब्रह्मानंद’ आके तुमको, मन की तपन बुझाना

Kuch Bhi Na Sath Me Jayega

नाम-जप
कुछ भी न साथ में जायेगा, अंतिम क्षण है अब दूर नहीं
ऐसे ही जीवन बीत गया, बस तेरी मेरी करके ही
शायद कुछ दिन हो अभी शेष, प्रभु क्षमा करो जो भूल हुई
जप सकूँ तुम्हारा नाम प्रभो, जो बीत गई सो बीत गई
मैं पड़ा तुम्हारे चरणों में, कहलाते तुम करुणा-सागर
हो कृपा तुम्हारा ध्यान धरूँ, हे भवभयहारी नटनागर

Guru Charno Me Shish Nava Ke Raghuvar

धनुष-भंग (राजस्थानी)
गुरुचरणों में सीस नवा के, रघुवर धनुष उठायोजी
बाण चढ़ावत कोई न देख्यो, झटपट तोड़ गिरायोजी
तीन लोक अरु भवन चतुर्दश, सबद सुणत थर्रायोजी
धरणी डगमग डोलन लागी, शेष नाग चकरायोजी
शूरवीर सब धुजण लाग्या, सबको गरब मिटायो जी 

Chanchal Man Ko Vash Me Karna

मनोनिग्रह
चंचल मन को वश में करना
दृढ़ता से साधन अपनायें, पूरा हो यह सपना
भोगों में दुख दोष को देखें, तृष्णा मन की त्यागें
भाव रहे समता परहित का, राग द्वेष सब भागें
प्रभु के यश का करें कीर्तन, ध्यान मानसिक पूजा
शरणागत हो चरण-कमल में, भाव रहे नहीं दूजा
प्राणायाम करें नियम से, सद्ग्रन्थों को पढ़ना
साँस साँस की गति के संग में, प्रभु-नाम को जपना
हो विरक्त अभ्यास के द्वारा, जीत लिया जग जिसने
रहा न करना अब कुछ उसको, हरि को पाया उसने 

Gokul Me Bajat Aha Badhaai

श्रीकृष्ण प्राकट्य
गोकुल में बाजत अहा बधाई
भीर भई नन्दजू के द्वारे, अष्ट महासिद्धि आई
ब्रह्मादिक रुद्रादिक जाकी, चरण-रेनु नहीं पाई
सो ही नन्दजू के पूत कहावत, कौतुक सुन मोरी माई
ध्रुव, अमरीष, प्रह्लाद, विभीषण, नित-नित महिमा गाई
सो ही हरि ‘परमानँद’ को ठाकुर, ब्रज प्रसन्नता छाई 

Koshalpur Me Bajat Badhai

श्री राम जन्म
कौशलपुर में बजत बधाई
सुंदर सुत जायो कौशल्या, प्रगट भये रघुराई
जात कर्म दशरथ नृप कीनो, अगणित धेनु दिवाई
गज तुरंग कंचन मणि भूषण, दीन्हे मन हरषाई
देत असीस सकल नरनारी, चिरजियो सतभाई
‘तुलसिदास’ आस पूरन भई, रघुकुल प्रकटे आई

Ab Me Nachyo Bahut Gopal

मोह माया
अब मैं नाच्यौ बहुत गोपाल
काम क्रोध को पहिर चोलनो, कंठ विषय की माल
महा मोह के नूपुर बाजत, निन्दा शबद रसाल
भरम भर्यो मन-भयो पखावज, चलत कुसंगत चाल
तृष्णा नाद करत घट भीतर, नाना विधि दे ताल
माया को कटि फैंटा बाँध्यो, लोभ तिलक दियो भाल
कोटिक कला काछि दिखराई, जल थल सुधि नहीं काल
‘सूरदास’ की सबै अविद्या, दूरि करो नन्दलाल

Jag Me Jiwat Hi Ko Nato

मोह माया
जग में जीवत ही को नातो
मन बिछुरे तन छार होइगो, कोउ न बात पुछातो
मैं मेरो कबहूँ नहिं कीजै, कीजै पंच-सुहातो
विषयासक्त रहत निसि –वासर, सुख सियारो दुःख तातो
साँच झूँट करि माया जोरी, आपन रूखौ खातो
‘सूरदास’ कछु थिर नहिं रहई, जो आयो सो जातो

Jo Sukh Braj Me Ek Ghari

ब्रज का सुख
जो सुख ब्रज में एक घरी
सो सुख तीनि लोक में नाहीं, धनि यह घोष पुरी
अष्ट सिद्धि नव निधि कर जोरे, द्वारैं रहति खरी
सिव-सनकादि-सुकादि-अगोचर, ते अवतरे हरी
धन्य धन्य बड़ भागिनि जसुमति, निगमनि सही परी
ऐसे ‘सूरदास’ के प्रभु को, लीन्हौ अंक भरी

Baso Mere Nenan Me Yah Jori

राधा कृष्ण माधुर्य
बसौ मेरे नैनन में यह जोरी
सुन्दर श्याम कमल – दल – लोचन, सँग वृषभानु किशोरी
मोर-मुकुट मकराकृति कुण्डल, पीताम्बर झकझोरी
‘सूरदास’ प्रभु तुम्हरे दरस को, कहा बरनौं मति थोरी